कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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भक्त हेत नरसिंह भेव ॥ कहै कवीर हरि भगती प्यार । प्रहलाद
उबान्यो अनेक वार ॥
वसंत ३५--बाजि बाजि रे मधुर वा मधुरि तान । तेरो तान
मेरो बसो ग्रान ॥ टेक ॥ प्रथम सहनाई बाजे नाद । मिटि गये
मनके विषै वाद ॥ ह्रम ह्रम खुली सुखकी खान । जन्म सुफल
कियो अपनो जानि ॥ दूजे घंटा बाजे घोर । तिमीर नासि भयो
दिवस भोर ॥ सुकृत वैन भयो थकित गात । बिसरे मनको पाँच
सात ॥ तीजे संख ध्वनी पडचो कान । गति पलटी मति भई आन ॥
जन्म जन्मके पाप फंद । नास भये सब दुख द्रन्द्व ॥ चौथे नाद जो
बाजे झांजि । कसमल मनके डारे मांजि ॥ अहंकारको काटचो
सीस । चित्त चंचल गति घटत दीस ॥ पाँचवें तंती सुर सोहाय ।
राग अखंडित गीत गाय ॥ लगे सुहावन होय आनंद । जम
जालिमके कटै फन्द ॥ छठवें बाजे मंजीरा ताल । जरा मरनका
मिटै साल ॥ पाँच सखिनके भयो चैन । सरवन सुनत सुख
पीवके बैन ॥ सतवें बाजे सरस बीन । तन हारचो मन भयो
लीन ॥ निगम निरंतर धरचो ध्यान । सुधि विसरी बुधि भई
विज्ञान ॥ आठवें तूर मोहि बहुत प्यार । तू मति मोते होय
न्यार ॥ साधु संत तेरा ध्यान लेहिं । तेरे सुनत पीव दरश देहिं ॥
नवमें बाजे करनाली भेरि । अगम अगोचर निरखि हेरि ॥ जागत
जागत रैन जाय । हेरत हेरत दिन विहाय ॥ बड भागी सुनै दसूं
नाद । जिहि सुनि भागै सकल वाद ॥ मेघ नादमें रहै समाय ।
सुरति निरन्तर अग्र जाय ॥ यकादस बाजे नौबत घोर । गगन बंब
बहु उठै सोर ॥ शब्द सुरति तहां करि विचार । पैठि गये गहि
मकर तार ॥ द्वादस मध्ये भयो प्रगास । मन मनसाको भयो नास ॥
बाजे अनंत नहि अंत ओर । सेत पुहुप अरु सेत भौर ॥ देख्यो