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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६६३)

खुटान बनिज टूट । चहुँ दिशि टांडो गयो फूट ॥ कहै कवीर
विष यह बनि बादि । पड़ि गोनिको देय लादि ॥

वसंत ३०—ऐसो नगर निरंजन बसो न जाय । जहाँ धरम राये
मांगै धराय ॥ टेक ॥ काया पुर पटन दसूँ हुवार । ऊँची कुलफ
दिठ लगे के वाँहू ॥ पांच जना नहि माने कोय । सुसै चोर घर
बेग सोये ॥ तत वदरे आये प्रचंड । घर मोदीको कियो है वंघ ॥
भाजि चले पाँचूँ घरधान । ले मोदी गुदरी दीवान ॥ सहली घाट
अरु झीनी बाट । द्ररग जगाती रोके घाट ॥ डांड लगेका पूछे
मोहि । पूछे जावों कहा देव तोहि ॥ सब अनाथ मैं कहूँ काय ।
कहौ कौन विगुचे इहां आये ॥ मैं तो बहूँ चरन धीर । सुखसागर
होय मिले कबीर ॥

वसंत ३१—ऐसो संगवास मोहि वस्यो न जाय । जहाँ आप
स्वारथी पांचू भाय ॥ टेक ॥ अटपट कुनबा बारह बाट । फिरि
फिरि जल पीवै दसो घाट ॥ नैन नासिका जीभ्या कान । इद्री
स्वाद चाहे आन आन ॥ काम क्रोध को कठिन जार । भवसागर
सुझे वार न पार ॥ चहुँ दिसि पसरचो माया फांसि । जहाँ मन
बंधे करम बास ॥ दुख सुख व्यापे दोनो भांति । काया नगरमें
परिहै भांति ॥ कहैं कवीर कहा कथिये ज्ञान । दो तलवारको
एकहि म्यान ॥

वसंत ३२—मेरो हार हिरानौ मैं लजांव । सांस दुराचर्नी पीव
डरांव ॥ टेक ॥ हार गयो मेरो राम धाग । बिच बिच मानिक
लाल लाग ॥ तरन पियाला परम जोति । अंतर अंतर लगे है
मोति ॥ पांच सखी मिलिहैं सुजान । चलि जइये तीर वेनी नहान ॥
नहाय धोय सिर तिलक दीन्ह । ना जानो हार मेरी कौन लीन्ह ॥