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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(६६१)

पूजे पषान ॥ कोई गिरही कोई फिरै उदास । कोइ नग्र त्वचा
गुफामें वास ॥ कोई डंड कमंडल धूमपान । कोई उरध तपस्या
गोड तान ॥ कोई दूधारी पवन आस । कोई अग्नि जराचे चहुँ पास ॥
कोई छत्र धारी धज निशान । कोइ सुरासन मुख खेत ठान ॥
कोई पीर औलिया करै मिजाद । कोई षट् दरसनमें करै बाद ॥
कोइ उदय अस्त दहना वल देय । कोई चारि मास जल सैन लेय ॥
कोई बहुत भेष धरि करै स्वांग । कोई साधे धतूरा पोस्त भांग ॥
कोई उरध कपाली आसन राधि । कोई निशि वासरकी निद्रा
साधि ॥ कोई रिद्धि सिद्धि करामाति जान । कोई जोगी सुद्रा
पहिरै कान ॥ कोई अलह कहै कोई कहे राम । हिन्दू तुर्क दोय
धर नाम ॥ सकल ब्रह्म समान एक । कहैं कवीर लीला अनेक ॥

वसंत २५-ऐसे सबै मद माते कोई न जाग । संगहि चार घर
मूसन लाग ॥ टेक ॥ जोगी माते जोग ध्यान । पंडित माते पंडि
पुरान ॥ तपसी माते तपके भेव । संन्यासी माते अह भेव ॥ माते
ऊधो औ अकरूर । हनुमत माते लिये लंगूर ॥ शिव माते हरि
चरन सवे । कलि माते नामा जय देव ॥ जैनी माते करम बाद ।
जंगम माते घंट नाद ॥ सुल्या माते देदे बांग । राम विमुख सब
भूले सांग ॥ राजा माते भरि भंडार । रानी माती करि सिंगार ॥
दानी माते दे दे दान । प्रजा माती विषया पान ॥ ब्रह्म रटत है
चारों वेद । रावन गइयो घरके भेद ॥ या मनुवाको अध्यक्षम
काम । ताते कहै कवीर भजु सत्त नाम ॥

वसंत २६-नारि नाहि संतो हरि तुम्हार । बिना मूल जैहो
जनम हार ॥ टेक ॥ हरिश्र्वंद समान नहि दानी आन । निज रानी
सहित पुत्र विकान ॥ विन विचार चित लियो है मानि । हरिचंद
भरो डोम घर पानि ॥ पांडव कहिये सब सौ जोर । तिनका पाँव