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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(६५५)

बास ॥ बाजै नाद अखण्ड घोर । ताल मृदंगका बहुत सोर ॥
बिन पग निरति तहाँ होय नाच । बिन मुख बोले शब्द सांच ॥
फुले वसत बिन पुष्टुप वेल । सेत भँवर तहाँ करै केल ॥ नाना
वरन अरु नाना रंग । बिन सरवर तहाँ उठे तरंग ॥ उनमुनिता
जो होय नैन । सो लखि पावे संत सैन ॥ कहै कबीर कोई लहै
न अन्त । मुखसागरमें मुखख बसंत ॥

वसंत ११-ऐसो खेलो संतो मन भये बिसारि । जम जालमकी
मेटो रागि ॥ टेक ॥ जहाँ पांच मवासी घेरै गैल । मन राजा तहाँ
करै खेल ॥ सखी पञ्चीस तहाँ करै सोर । अनहद बाजा बजै घोर ॥
ज्ञान गलीमें बाढै आय । सुरति निरति कोसंग लाय ॥ करि सनेह जो
खेले फाग । भवसागरका करहु त्याग ॥ होय अचिंत जो चिन्ता
मिटाय । सतगुरु पद मैं रहै समाय ॥ कहै कबीर गुरु किरपा
कीन । भय छूटा तब फगवा दीन ॥

वसंत १२-तुम सुनियो संतो जुग वसंत । कोई अगम विवेकी
बूझै संत ॥ टेका ॥ बसे नगर तहाँ उठै घोर । पांच सखी तहाँ करै
सोर ॥ रंग रंगीली नौऊ नारि । विषम सरोवर रची धमारि ॥
नाना विधि सों करै कलोल । ताल मृदंग अरु बाजै ढोल ॥
चौरासी पिचकारी हाथ । लिये सखी सब फिरै साथ ॥ अहं गुलाल
लिये गोद माँहि । सुर नर मुनि कोइ बच्यो नाहि ॥ मन राजाके
सबही संग । बाढे भये तहाँ जमुना गंग ॥ उततैं आये ज्ञान बीर ।
सुरति निरति लिये संग धीर ॥ पिचकारी हित प्रेम लीन । सुमति
सखीके हाथ दीन ॥ सेत अबीर उडावै हेल । ऐसा अद्वुत अगम
खेल ॥ कहै कबीर कोई लखै साथ । जिन त्रिगुन तापकी तजी
उपाधि ॥