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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(६५२)

कवीरपंथी—

अमर होय पद अमर लहै ॥ कहै कवीर थिर कहो बुझाय ।
थिर समाय अमृत फल पाय ॥

वसंत ३—अनभै बसंत खेलो सुजान । भरम भाव नहि होय
हानि ॥ टेक ॥ प्रथम वसंत मेल्यो शरीर । गुरु संजम मन धरो
धीर ॥ पिचकारी करि हेत लीन्ह । काम कोधको टारि दीन्ह ॥
दूजे मेरो मन महामंत । ताको काहु न लह्यो अन्त ॥ कुबुधि
गुलाल उड़ावै सोय । सुर नर सुनि सब गये विगोय ॥ नाद विंद
तहां लागे बंद । यह वसंत थिर होय कंद ॥ थिर होय विंद प्रकासे
चंद । परम ज्योति परगट अनन्द ॥ कहै कवीर यह परम खेल ।
सत्सुकृत सो भय मेल ॥ काल जाल सब दीन्ह मेट । तब
पार ब्रह्मसो भई भेट ॥

वसंत ४—जहां सुरति सुहागनि खेले फाग । पार ब्रह्म तहां करै
राग ॥ टेक ॥ अनहद सुरली बाजे तूर । विन रसना सुर ऊठत
पूर ॥ ध्वनि सुनि सीतल भयो गात । सरवन रुचत नहीं और
बात ॥ लौकर भूषन पहै अंग । सीलको सिंदुर दियो है मंग ॥
लखि दर्पन सतगुरुके बैन । ज्ञानको अंजन दियो है नैन ॥ लोक
लाज सब डारि दीन्ह । प्रेम छाड़ी गह हाथि लीन्ह ॥ सुमति
सखीको कियो संग । रच्यो खेल जहां विविध रंग ॥ घेरि घारि
जब होरी कीन्ह । ब्रह्म अग्नि जहां लेस दीन्ह ॥ सब जरि गई
उड़ानी धूरि । ब्रह्म निरंतर रह्यो पूरि ॥ गगनि गली जहां मगन
रुयाल । तहां लखि पायो अलख लाल ॥ हिलि मिलिकै किन्हौ
विलास । जनम जनमकी मिटी भास ॥ रसातल भूतल अरु
अकास । प्रेम सुगन्धकी फैली वास ॥ कहै कवीर मोहि भावै संत ।
जो या विधि खेलै रिनु वसंत ॥