कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 662, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(६४८)
कवीरपंथी—
पांच ज्ञानेन्द्रियोंके नाम ।
श्रोत्र त्वचा चक्षु कही, जिह्वा जान प्राण ।
पाँचों इन्द्री ज्ञानकी, साधन ज्ञान समान ॥ ८३ ॥
त्रिपुटी व्याख्या ।
अब इन्द्रिनके विषय अरु, देवहुँ कहौँ बखान । सुनियो शिष्य
सु ध्यान दे, प्रत्यक्ष बचन प्रमान ॥ ८४ ॥ इन्द्रीसो अध्यात्म है,
विषय जानु अधिभूत । अभिमानी अधिदेव है, सो त्रिपुटी समझत
॥ ८५ ॥ पाँच कर्म पंच ज्ञान रु अन्तःकरणहु जो पाँच । इन्द्री
पन्द्रह जानिये, कहौँ त्रिपुटी सु बाच ॥ ८६ ॥
पांच कर्म इन्द्रियोंकी त्रिपुटी ।
गुदा विषय मल त्याग है, देव अहे यमराज । उपस्थ विषय
सो भोग है, परजापति महाराज ॥ ८७ ॥ गमन विषय है पाँवका,
वामन देव कहाय । पाणि विषय आदान है, देव इन्द्र बलराय
॥ ८८ ॥ बाक विषय है बोलना, अग्नि देव अधिकार । त्रिपुटी
इन्द्री कर्मकी, मनमें राखु विचार ॥ ८९ ॥
पांच ज्ञानेन्द्रियोंकी त्रिपुटी ।
देव अश्विनी कुमार है, इन्द्री प्राण प्रमान । विषय गहत् है
गंधको, इन्द्री ज्ञान समान ॥ ९० ॥ जिह्वा इन्द्री ज्ञान है, देव
वरुण पहिचान । ग्रहण करै रसको विषय, अद्भुत कला निधान
॥ ९१ ॥ चक्षु देखे रूपको, देव सूर्य भगवान । इन्द्री त्वचा विषय
स्पर्श, वायु देव पिछान ॥ ९२ ॥ शब्दहि गहे सो श्रोत्र है, देव अहे
दिकपाल । त्रिपुटी इन्द्री ज्ञानकी, महा कठिन भ्रमजाल ॥ ९३ ॥
पांच अन्तःकरणकी त्रिपुटी ।
० अन्तःकरण अध्यात्म है, स्फुरण सो अधिभूत । महा विष्णु
अधिदेव है, व्यापक विश्व विभूत ॥ ९४ ॥ मन जहाँ अध्यात्म है,
अहे चन्द्र तहाँ देव । कल्प विकल्प अधिभूत है, जगका कारण
भेव ॥ ९५ ॥ बुद्धि स्वतः अध्यात्म है, है निश्चय अधिभूत । ब्रह्मा
तहाँ अधिदेव है, अनुभव लागू सूत ॥ ९६ ॥ चित अध्यात्म