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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६४५)

शिष्य प्रपन्न ।

देह अरु अवस्था कही, हे गुरु मुनिवर भूप ।
परगट आप बखानिये, दीजे ज्ञान अन्नूप ॥ ४९ ॥

गुरु उत्तर-छः प्रकारकी देह ।

हृश्यमान जो जगत है, जानो देह मुजान । तासु भेद अव
कहत हौं, सुनो शिष्य दे कान ॥ ५० ॥ पट प्रकारकी देह है,
जामें अरुझा जीव । जीव शीवके भेद ते, भयो दास अरु पीव
॥५१॥ स्थूल सूक्ष्म कारण अरु, महाकारण पुनि जोय । कैवल
पंचम जानिये, छठी हंस कहि सोय ॥ ५२ ॥

छः अवस्थाके नाम ।

जागृति स्वप्न सुषुप्ति है, तुरिया तुरिया तीत । पूर्ण अवस्था
बोध पुनि, छओं देहकी रीत ॥ ५३ ॥ निज निज कर्म प्रतापते,
सुख दुख भोगन हेत । स्थूल शरीर प्रगट है, पांच पचीस
गहि लेत ॥ ५४ ॥

पंचीकृत ।

तमगुणके प्रतापते, पांचों भेलम भेल । पंचीकृत सोई अहे,
स्थूल जगतको खेल ॥५५॥ एक एकते पांच भई, प्रकृति पचीस
निदान । ताही ते सब परगटे, पिण्ड ब्रह्माण्ड मुजान ॥५६॥

पचीस प्रकृति ।

अस्थि मांस नाडी त्वचा, रोम पाँचवों होय । पृथिवते यंह
सब प्रगटे, प्रकृति कहावत सोय ॥५७॥ रक्त बीज अरु मूत्र जो,
परसेवा युत लार । जल प्रकृति यह पाँच हैं, मनमें देखु विचार,
॥५८॥ आलस कांति क्षुधा तृषा, निद्रा पंचम जान । अगिन,
प्रकृति यह पाँच हैं, जाने संत मुजान ॥ ५९ ॥ कटि उदर,
हिरदय गला, पंचम शिर आकाश । पाँच जानु यह गगनकी,
कीन प्रकृति प्रकाश ॥६०॥ भय मोह अरु क्रोध है, काम जानिये
लोभ । सूक्ष्म प्रकृति आकाशकी, जाते उपजे क्षोभ ॥ ६१ ॥