कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 659, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(६४५)
शिष्य प्रपन्न ।
देह अरु अवस्था कही, हे गुरु मुनिवर भूप ।
परगट आप बखानिये, दीजे ज्ञान अन्नूप ॥ ४९ ॥
गुरु उत्तर-छः प्रकारकी देह ।
हृश्यमान जो जगत है, जानो देह मुजान । तासु भेद अव
कहत हौं, सुनो शिष्य दे कान ॥ ५० ॥ पट प्रकारकी देह है,
जामें अरुझा जीव । जीव शीवके भेद ते, भयो दास अरु पीव
॥५१॥ स्थूल सूक्ष्म कारण अरु, महाकारण पुनि जोय । कैवल
पंचम जानिये, छठी हंस कहि सोय ॥ ५२ ॥
छः अवस्थाके नाम ।
जागृति स्वप्न सुषुप्ति है, तुरिया तुरिया तीत । पूर्ण अवस्था
बोध पुनि, छओं देहकी रीत ॥ ५३ ॥ निज निज कर्म प्रतापते,
सुख दुख भोगन हेत । स्थूल शरीर प्रगट है, पांच पचीस
गहि लेत ॥ ५४ ॥
पंचीकृत ।
तमगुणके प्रतापते, पांचों भेलम भेल । पंचीकृत सोई अहे,
स्थूल जगतको खेल ॥५५॥ एक एकते पांच भई, प्रकृति पचीस
निदान । ताही ते सब परगटे, पिण्ड ब्रह्माण्ड मुजान ॥५६॥
पचीस प्रकृति ।
अस्थि मांस नाडी त्वचा, रोम पाँचवों होय । पृथिवते यंह
सब प्रगटे, प्रकृति कहावत सोय ॥५७॥ रक्त बीज अरु मूत्र जो,
परसेवा युत लार । जल प्रकृति यह पाँच हैं, मनमें देखु विचार,
॥५८॥ आलस कांति क्षुधा तृषा, निद्रा पंचम जान । अगिन,
प्रकृति यह पाँच हैं, जाने संत मुजान ॥ ५९ ॥ कटि उदर,
हिरदय गला, पंचम शिर आकाश । पाँच जानु यह गगनकी,
कीन प्रकृति प्रकाश ॥६०॥ भय मोह अरु क्रोध है, काम जानिये
लोभ । सूक्ष्म प्रकृति आकाशकी, जाते उपजे क्षोभ ॥ ६१ ॥