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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६३३)

बिचारी ॥ रोगी रहे तदवीर कराईं । पढे नमाज मासको खाईं ॥
दो घडी रात रहे फिर जगहीं । सरगही खाय परे नर तबहीं ॥
जीव हने कहें खाया खुदाईं । उनका उलस लिया हम खाईं ॥
पीर पैगम्बर सबहीं खाया । जबह किया फातिया दिलाया ॥
साद भया तब ध्यान पर आया । सब देवनको अरप चढाया ॥
पहले भोग देवको दीन्हा । तब वह खाय आप फिर लीन्हा ॥
वैस्वदेव करे चितलाई । देव पितरको दीन खवाई ॥

समे--यहि धंधा दोनों मरे, करता चीन्हे नाहिं ।

बिन समझे जाने सुमिरे, यही भूल जग माहिं ॥

रमैनी २७३--कहो महम्मद मोहि समुझाईं । मामा होवा
कहांते आईं ॥ आदम किसका पुत्र कहाया । उन कैसे विश्वरूप
बनाया ॥ पंडित अपना खोल पुराना । विश्वरूपका करे व्याना ॥
ब्राह्मण ब्रह्मा कहांते आय । कैसेके यह सृष्टि उपाय ॥ लौट
उमील करे बयाना । ओंकारको दीन प्रवाना ॥ कौन रूप
कौनसा गाऊं । कौन देश निरगुनका नाऊं ॥

समे--पुरुष नार एक संग हैं, साथ बीज अंकूर ।

देश विलायत सुन्न पर, परिपूर्ण सदा हजूर ॥

रमैनी २७४--दोई दीन कहांते आये । कहो कैसे दो दीन चलाये ॥
वेद न काहू पेट पढाया । सुन्नत कराय तुरुक नहिं आया ॥ देव
न देहरा रामउ खाये । पीर मसीत न अल्लह बनाये ॥ वेद पुरान
न राम बखाना । अल्लह न पढा किताब कुराना ॥ रोजा नमाज
न अल्लह पढाया । पूजा अरचा न राम बताया ॥ पूरब राम न
कहा संदेशा ॥ पश्चिम अल्लह न कहा उपदसा ॥

समे--बहे लोग सब जात हैं, दो अगुवाके साथ ।

कहैं कवीर ऐसा कोइ नाहीं, जो गहि राखे हाथ ॥