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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(६०१)

समै--जहँ देखा तहँ रामको, बिन यक राम न कोय ।
बातन हमे जगत प्रवोये, बातन राम न होय ॥

रमैनी १८१--देखो देखो यह नर ज्ञाना । आप तजत पूजत
पाषाना ॥ कोई सिद्ध करे धुन पाना । कोई रह गोड उलाटे ताना ॥
कोई बैठा तज अन्न अहारा । कोइ बैठा आसन मारा ॥ कोइ करे
नित तरपन जापा । कोई धर्म करे तजि पापा ॥ कोई घर तजि
भये ब्रह्मचारी । कोई अन्न तजि दूधाधारी ॥ कोइ बैठा तन खास
लगाई । कोइ बैठ तन तिलक दिखाई ॥ मठ मंडपा कोइ पढ़ुंचा
जाई । कोई सुन्नमें रहा समाई ॥ कोई चढावे उलटा पवना । कोइ
सकल तजि भया सु मौना ॥ कोइ श्रुति स्मृति पढे पुराना ।
कोई तीरथ बरत जो दाना ॥ कोई देश दिसंतर जाई । हरि गुन
गाई अन्न न खाई ॥ कोइ करे काया प्रछाला । कोई डाले फिरे कंठी
माला ॥ कोइ करता नित राग औ रंगा । कोइ करते देव सुनीका संगा ॥

समै--देखा देखी सब जग भरमा, मिला न सद्धरु कोय ।
कहें कवीर कर कर नित संशय, जियरा डारा खोय ॥

रमैनी १८२--घट फूटे जल सब बह जाई । काठ जरे पावक
सब जाई ॥ फूल सुखाने बास न होई । घटमें चंद न पावे कोई ॥
दूध बिनासे निकसे न घीव । बिन तन कैसेहु रहे न जीव ॥
कांसी फूटे धुन नहि आई । बिजना टूटे पवन नसाई ॥

समै--बिन तन कोई लखे न जियरा, बिन तन झूठा रूप ।

कहें कवीर झूठा किन्ह पंडित, ऐसा ल्याल अनूप ॥

रमैनी १८३--सीते सात भई सितलाई । सीते सीत रोग होय जाई ॥
सीतल मिला सो साधु कहाई । सीत बिहूना साध न पाई ॥
सीतल होय तब सीतल पावे । सीतल होय तब सीत न जावे ॥
सीते सीत अमर नर होई । सीतल राखे ज्ञानी सोई ॥