कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
जिन जाना यहि भेदको, रहे सोई ठहराय ।
कहँ कवीर सो रहे निनारे, लिया जिन्हे जम खाय ॥
रमैनी १३२—राम कहा यह कहे जो कोई । जो करता सो
यहु होई ॥ करता रहा जो सबै समाई । वोकर राम रहा बिलमाई ॥
पंच तत्त्व करताको बासा । यह विध राम न होय बिनासा ॥
बीजमें बृच्छ रहे ठहराई । त्यों यह बूझ एक है भाई ॥ सो कत
होय यह कहे जो कोई । जल पाषाण अगिनको होई ॥ सुरत मरे
तो यह मर जाई । दोहरा नौतम कैसे पाई ॥ संजोगी जो सृष्टि
उपाई । अद्वुत तन जिव कहँसे आई ॥ राम न करता करता काहा ।
यह करता तो बूझन माहा ॥ दे शब्द उत्पन सुस्थाना । दोऊकी
बूझ एक घर जाना ॥ बूझ दोऊकी सुन्न समानी । तत्त्व अधिक
इच्छा कित मानी ॥ जो यह करता सृष्टिको होई । प्रगट गुप्त
कहे सब कोई ॥
समै—यह करता बिन बूझ हेराना, ताते भया अकास ।
तत्त्व न मिला मत समुझा, लीन्हा तहाँ निवास ॥
जो गुन पावे तत्त्वको, तत्त्वे जाय समाय ।
कहँ कवीर अमर तब होवे, कहीं न आवे जाय ॥
तन जियरा यह तेरा, कबहुँ नास न होय ।
कहँ कवीर सुरति मिले, यह गुण बूझे सोय ॥
रमैनी १३३—परकाया प्रवेस कराया । बाल बृद्ध तन दिख-
लाया ॥ एक रूपमें धरे अनंता । पर दिलकी पहेचाने चिंता ॥
पूरवमें परिचय दिखलाई । पृथ्वीते अकास सिधाई ॥ धरन ते
बाढी जाय अकासा । लीला अनूप रचे बहु पासा ॥ ऊँ बीज
मैघ दिखलावे । धरती बूडे पवन चलावे ॥ चाहे जो ले आवे
सोई । चाहे पुरुष चाहे होय जोई ॥ दसो दिसाकी बातें करई ।