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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(५८०)

कवीरपंथी-

करो घट जाय न फूटी । सुरतकी डोर जाय न टूटी ॥ गुन टूटे
औ घट बह जैहै । औघट गये घाट न पैहै ॥

समै-सहस्र घाट जल भर रखो, फूटे सहस्सर घाट ।
घट फूटा तो फूट भय, भया न नर तल पाट ॥
घट बाहर घट अंदर, घट है जीवन मूर ।
घटमें जल पूर रहे, औघटमें जल दूर ॥

रमैनी १२२-जुग २ जोगी जुगत कराई । जुगत लखे विन
जम ले जाई ॥ जोगी सोई जुगत सो माने । जुगत जान अलख
पहिचाने ॥ उवाव अनंत जाने भाई । तेहि जोगीको काल न खाई ॥
सोहं हंसा हमही भाई । सोहं मिले सोई हम पाई ॥ नगरी अपनी
सुवस बसावे । प्रजा लोग दुख नहीं पावे ॥ प्रजाके बस होवे ना
राऊ । राजा दुख न देवे काऊ ॥ सो जोगी सो जुगत सयाना ।
आप जान दूजा नहि जाना ॥

समै-जेहि पारस ते पारस भये, पारस जानो सोय ।
पारस कनक लोहा भया, सो पारस ना होय ॥
वह पारस तुम खोजो, जेहि पारस सब खान ।
कहैं कवीर सुन पंडिता, पारस ले पहिचान ॥

रमैनी १२३-काया नगर सो नगर हमारा । घर अपना हम
कीन्ह संसारा ॥ घरही में है देव औ देवी । घरहीमें है भेव औ
भेवी ॥ पाप पुन्य घरहीमें रहते । घरहीमें रैयत औ महते ॥
घरहीमें वृच्छ बीज अंकुरा । घरहीमें चंदा औ सूरा ॥ तीन लोक
घरहीमें छाया । घरते बाहर किनहु न पाया ॥

समै-जो घर जावे आपना, करता पड़े तेहि सूझ ।
कहैं कवीर सुन पंडिता, घर अपनेको बूझ ॥