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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५६७)

समै-एक पच्छ अस्थान भंग है, एक लीन्है अस्थान ।
कहैं कवीर सुनो ब्रह्मज्ञानी, सो अस्थाने जान ॥

रमैनी ८८-सुन्य नगर जाको वार न पारा । इक्कीस सरग
ब्रह्मंड अपारा ॥ बचन मोर तुम सुलु तिर देवा । आद पुरातम-
को यह भेवा ॥ रंकार धुन निरगुन होई । जोग रस कर देखे
कोई ॥ वाहीकी हम हैं बहुत पियारी । तुम्हरे कारन भई निनारी ॥
तुम ना जानो पिताका भेवा । पिता का समझो तुम त्रिय देवा ।
यह भौसागर महा विकरारा ॥ समझ पुत्र तुम होहु निनारा ॥
ध्यान धरो तुम तीनों भाई । सुन्य नगर तुम रहो समाई ॥

समै-वहां नहीं पिता तुम्हारो, हम हैं पिता तुम्हार । वेनारी
हम उनके पुरुष, बिच राखा निरंकार । माता कहा सोई हम मानत,
तुम्हरी झूठी बात । प्रथमे माय हमारी सेवा, जाका यह विस्तार ॥

रमैनी ८९-निरगुन पुरुष पुजावे देवा । आवो माता करें हम
सेवा ॥ माता कहो हमे समझाई । कौन पुरुष ते ध्यान लगाई ॥
जो तुम कहो सोई हम जानी । और का कहा न कबहुँ मानी ॥
लौट माता पुत्रन समझावे । निराकार निरगुन बतलावे ॥ हमें
मेट ठहरावे देवा । आदि कथाका कहैं न भेवा ॥

समै-हमे दुराय ठहरावे धोखा, ऐसी त्रिया अनखान ।
कहैं कवीर मानों त्रिदेवा, माताकी पहिचान ॥

रमैनी ९०-हम बूझें ब्रह्मा ते कहानी । कहो का कहा आन
भवानी ॥ लौट ब्रह्मा निज कहैं कहानी । माता बचन निरगुन
हम जानी ॥ नीरी कोइ न वह सनेहा । पांच तत्त्वकी धरे न देहा ॥
निहतत्त्व निरगुण निराकारा । निहकामी बहे वार न पारा ॥
बरन न मेख न पीवे न खाई । कर्म रहा सब जग ठहराई ॥ वह
निहकर्म त्रिगुन ते न्यारा । गगन मंडल हम देखत अपारा ॥