कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवारिषा-
रमैनी ६३-अंते दूढे सब संसारा । करता निकट न लखे
गंवारा ॥ आद उपदेश समाध लगाई । अंग बिहूने रहा लौ
लाई ॥ पांच तत्त्वका नास कराया । निराकार समाध पर
आया ॥ पांच तत्त्व जीव है सोई । तत्त्व हीनता पुरुष न कोई ॥
चार ठौर गुरुवा दिखराया । तेहि धोखे मिल सुन्य समाया ॥
समै-पांचतत्त्व निज मूल है, हम करता इन माहिं ।
नख सिखते पूर्ण बना, सो फिर अंते नाहिं ॥
रमैनी ६४-धोखे २ गया समाई । धोखा की कछु खबर न
पाई ॥ धोखे धोखे भया अकाजा । धोखे गया जीव विन काजा ॥
धोखे २ वह भइ न्यारी । धीरज न कीन्ह बिलग गइ नारी ॥
धोखे २ सब घर खोया । धोखे बीज धोखे कह बोया ॥
समै-हसों तो दाव परखिये, रोवों काजर ढरि जाय ।
मनही मन के बूझना, ज्यों काटे चुन खाय ॥
रमैनी ६५-हमरा यहै तन जियरा भाई । आस बांध सुन्यमें जाई ॥
आसा काल अहेरी आया । तिन मेरे तीनों पुत खाया ॥
जहं लग मोर बीज बिस्तारा । तहं लग आसा कीन्ह ख्वारा ॥
केतो चेतावों चेते नाहीं । अचेत पिंड सदा भरमाहीं ॥
कहा हमार न मानै कोई । पुरुष अपन आपन मत जोई ॥
समै-संसे खायो खेत, केत्र बर लोही भयो । वाय जगतकी
रीत, हीरा जर कोयला भयो ॥ उपज विनसमें सब परे, कोई
भया न थीर । करता अपन न चीन्हई, कासों कहें कवीर ॥
रमैनी ६६-हम दूढा यह सब संसारा । कोई न माने कहा
हमारा ॥ सुन्य सिखरमें मन अरुझाना । सुन्य सेइके सुन्य
समाना ॥ बिरला बूझै बात हमारी । धोखा न तजे बसे संसारी ॥
समै-बहुत मिले बहु भांति, मन अनमिल सब सो रहा ।