कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सा०-गुरु गोविन्द अरु सिष मिलि, कीन्हा भक्ति विवेक । तिर-
बेनी धारा बही, आगे गंगा एक ॥ गुरुकी महिमा अनंत है, मोसो
कही न जाय । तन मन गुरुको सौंपिकै, चरणों रहो समाय ॥
रमैनी १८-गुरु सतपद भवु अमृत बानी । गुरु बिनु सुक्ति
नहीं रे प्राणी ॥ गुरु आदि गुरु अन्त ज्ञाता । गुरु हैं सुकति पदा-
रथ दाता । गुरु गंगा कासी अस्थाना । चार वेद गुरु गमसे
जाना ॥ अरसठ तीरथ भरमि भरमि आवे । सो फल गुरुके
चरणों पावे ॥ गुरुको तजै भजै जो आना । ता पसुआको फोकट
ज्ञाना ॥ गुरु पारस परसे जो कोई । लोहाते जिव कंचन होई ॥ सुक
गुरु किये जनक विदेही । सो भै गुरुके परम सनेही ॥ नारद गुरु
ग्रहलाद पढाये । भगति हेतु जिन दरसन पाये ॥ काकभुसुंड
संभु गुरु कीन्हा । अगम निगम सबही कहि दीन्हा ॥ ब्रह्मा गुरु
अगिनको कियेऊ । होम जग्य जिन विद्या दियेऊ ॥ वशिष्ठ
सुनि गुरु किये रघुनाथा । पाये दरसन भये सनाथा ॥ कृष्ण
गये दुर्वासा सरना । पाये भगति तब तारन तरना ॥ नारद उप-
देश धिमरसे पाये । चौरासीसे तुरत बचाये ॥ गुरु कह सोई है
सांचा । बिनु परचे सेवक है कांचा ॥ गुरु समरथ सबके पारा ।
गहे शरण उतरे भवपारा ॥ कहैं कवीर गुरु आप अकेला । दशो
औतार गुरुका चेला ॥
सा०-राम कृष्णसों को बडा, तिनहु तो गुरु कीन्ह । तीन लोक
के वे धनी, गुरु आगे आधीन ॥ हरिसेवा युगचार है, गुरु सेवा
फल एक । तासु पटन्तर ना तुले, संतन किया विवेक ॥
गुरुउपदेश महिमा ।
दोहा-गुरु संत वन्दन करूं, ऐहै सुखको पूर ।
गुरु महिमा बरनन करूं, शिर धरि पद रज धूर ॥