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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५३३)

जनमको मिटे संतापा ॥ गुरुके चरण सदा चित दीजे । जीवन
जन्म सुफल कर लीजे ॥ गुरुके चरण सदा चित जानो । क्यों
भूले तुम चतुर स्यानो ॥ गुरु भगता मम आतम सोई । वाके
हिरदे रहो समोई ॥ गुरु सुख ज्ञान ले चेतो भाई । मानुष जन्म
बहुरि नहि पाई ॥ सुख संपति आपन नहि प्राणी । समझि देखु
तुम निश्चय जानी ॥ चौविस गुरु हरि आपहि करिया । गुरु सेवा
हरि आपहि धरिया ॥ गुरुकी निंदा सुने जो काना । ताको निश्चय
नरक निदाना ॥ दशवाँ अंश गुरुको दीजे । जीवन जनम सुफल
कर लीजे ॥ गुरु सुख प्राणी कोइ न दीजे । ह्रिदय नाम सदा
रस पीजे ॥ गुरु सीढी चढ़ि ऊपर जाई । सुखसागरमें रहे समाई ॥
अपने सुख निंदा जो करई । शूकर स्वान जनम सो धरई ॥
निगुरा करे मुक्ति कर आसा । कैसे पावे मुक्ति निवासा ॥ औरो
सुकित देइ जो पावे । सतगुरु बिन मुक्ती नहि आवे ॥ गौरी शंकर
और गनेशा । सबही लीन्हा गुरु उपदेशा ॥ शिव विरंचि गुरु
सेवा कीन्हा । नारद दीक्षा ध्रुवको दीन्हा ॥ सतगुरु मिले परम
सुखदायी । जनम जनमका दुख नसायी ॥ जब गुरु किया अटल
अविनासी । सुर नर मुनि सब सेवक रासी ॥ भवजल नदिया
अगम अपारा । गुरु विनु कैसे उतरे पारा ॥ गुरु विनु आतम
कैसे जाने । सुखसागर कैसे पहिचाने ॥ भक्ति पदार्थ कैसे पावे ।
गुरु विनु कौन जो राह बतावे ॥ गुरु सुख नाम देव रेदासा ।
गुरु महिमा उनहूँ परकासा ॥ तैतिस कोट देव त्रिपुरारी । गुरु
विनु भूले सकल अचारी ॥ गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम
अनेक नरकके वासी ॥ गुरु विनु पसू जनम सो पावे ॥ फिर २
गरभ बासमें आवै ॥ गुरु विमुख सोई दुख पावे । जनम जनम
सोई डहकावे ॥ गुरु सेवै जो चतुर स्याना । गुरु पटतर कोइ और

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