कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 545, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(५३१)
मिले वैराग दिदावे । गुरु मिले तो भगति घर पावे ॥ गुरुकी
कृपा सकल अंजोरा । गुरु कृपा जिव परे न भोरा ॥ ३ ॥ गुरु
मिले तो शब्द लखावे । बिन गुरुके भव भटका खावे । का गिरही
वैरागी भाई । गुरु कृपा सकलो तरिजाई ॥४॥ सार नाम सतगुरु
सो पावे । नाम डोर गहि लोक सिधावे ॥ धरमराय ताको सिर
नाई । जो हंसा सतगुरु पहुँ जाई ॥ ५ ॥
सा०-सतगुरु महिमा अनंत है, अनन्त करै उपकार ।
ई भवसिंधु अगाधते, तुरते उतारे पार ॥
रमैनी १४-सतगुरु चरननकी बलिहारी । करै सुखी सब कष्ट
निवारी ॥ चच्छु हीन जिमि पावे नैना । होवै ज्ञान सुनत गुरु
वैना ॥ १ ॥ सार शब्द सु विदेह सुरूपा । निअच्छर वहिरूप
अनुपा ॥ कहन सुननको शब्द चौधारा । सार शब्द सो जीव
उबारा ॥२॥ सो निज शब्द गुरुसो पावे । पाइ शब्द सतलोक
सिधावे ॥ धर्मदास तुम हंस अंकुरी । मोहि मिले कीन्ह दुख दूरी
॥३॥ जस तुम कीन्ह मो सन नेहा । तजि धन धाम नारि सुत
गेहा ॥ आगे शिष जो यहि विधि करिहैं । गुरु चरनन मन निश्चल
धरिहैं ॥४॥ गुरुके चरन प्रीति तन धारे । तन मन धन सतगुरु
पर वारे ॥ सो जिव मोहि अधिक प्रिय होई । तो कई रोक सकै
नहिं कोई ॥ ५ ॥
सा०-सरवस वारे चरनमें, शरण रहै लपटाय ।
सो जिव पावे मोहिको, रहै काल सुरझाय ॥
रमैनी १५-सिष होय सरवस नहिं वारे । हिये कपट सुख प्रीति
उचारे ॥ सो जिव कैसे लोक सिधाई । बिन गुरु मिले मोहि नहिं
पाई ॥१॥ गुरुसे करै कपट चतुराई । सो हंसा भव भरमें आई ॥
जो जन गुरुकी निन्दा करई । सूकर स्वान गरभमें परई ॥ २ ॥