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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(४९९)

फहम अकला विना ॥ फिरते रहे खुलान, फिकर दिलमें रही ।
अरे अवधू ! फिकर मिटे दिल माहिं, फकीरी तब सही ॥२२॥

बब्बा-बिबि अक्षर ठहराय, वृछ जो राखि हों। वेद शास्त्र बहु
ग्रन्थ, अदभुत भाखिहों ॥ बकता बकत विस्तार, बहु विधि ले
बढा। अरे हों अवधू ! भीतर भरी भंगार, कनक ऊपर मढी ॥२३॥

भम्भा-भरमें सकल जहान, कहे यहाँ कछु नहीं। आपहिं
फन्द बनाय, भरम कीन्हों सही ॥ डार भगमकी मोट, भरमना
करम है। अरे हों अवधू ! भीतर है भरपूर, तो बाहर भरम है ॥२४॥

यव्या-(जजा) जो तुम चतुर सुजान, जगत गुरु जानले ।
जिन सिरजी सकल जहान, ताहि पहिंचान ले ॥ एक ज्योति
जगमाहिं, जगामग होय रही । अरे हों अवधू ! उन थापी निनार,
तहाँ कछु है नहीं ॥ २५ ॥

ररा-राम राम सब जपे, राम सो ना मिले । आतम राम
विसार, सूत्रकूँ सब चले ॥ सूत्र सनेहो राम, कहो किन पाइया ।
अरे हों अवधू ! जुग जुग आतम राम, कवीर गोहराइया ॥२६॥

लछा-लाज बीज पत खोय, भांड मूरख भये । लाधा विष
निज मूल, लालसों ना लिये ॥ लगी दवा चहुँ ओर, लपटमें
सब परे । अरे हों अवधू ! कदहिं न गयो भम, सकल सरबस
बरे ॥ २७ ॥

बब्बा-वाही की परतीत, वाहि विन और न कोई । वो सबके
सिरताज, काज वासे सहि होई ॥ वह नहिं आवे जाय, सबन
सो भिन्न है । अरे हों अवधू ! ऐसी अकल विवेक, सबन किन्ह
है ॥ २८ ॥

सस्सा-संसय भयो अथाह, सासत जिवको भई । इहाँ मिल-
नको नाहिं, सिपत सबदिन कही ॥ सिद्ध साधु संसार, सबै