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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(४९७)

कि, लोभ निवारहू । क्षमा शील सन्तोष, सत्य हियमा धरो ।
अरे हाँ अवधू ! परख, बोलता ब्रह्म चीन्ह ताके करो ॥ ७ ॥

जन्मा-जग जीवन जगदीस, जगत गुरु जीव है । जाने जान
सुजान, सोई निज पीव है ॥ खोजो जो नव खण्ड, भेद निज
कहि दिया । अरे हाँ अवधू ! जुग जुग अविचल जीव, कवीर
गुरु कहि दिया ॥ ८ ॥

झइझा-झूठ झगरा छोड़, इन्द्रमें कहा परो । झलक मनी
उजियार, निकट हियमें धरो ॥ झाड़ पातको छोड़, सार निज
ताय ले । अरे हाँ अवधू ! कहा झखे मतिहीन, परम गुन
गायले ॥ ९ ॥

नन्ना-नाह छोड़ि नरा, नार चली है जारपै । पियाकी सुरत
बिसार, तो आशिक यारपै ॥ नीच बुद्धि मतिहीन, नहीं स्वारथ
भयो । अरे हाँ अवधू ! जार बसे हिय माँहि, नरक ताते
गयो ॥ १० ॥

टट्टा-टीडी भया जहान, उडा आसमान कूँ । हटा नेह
निदान, चला घमसामकूँ ॥ टाराही नहिं टरे, भरम धोखा परा ।
अरे हाँ अवधू ! कठिन, टेक मनमें धरी, तार टूटिया मरा ॥ ११ ॥

ठट्टा-है ठोरेके ठोरे, दूर धोखा भया । ठोकै सबहिं कपाल,
गुसैयां कित गया ॥ ठठके बेडा बांधि, पार कोई ना तरा ।
अरे हाँ अवधू ! ठाकुर, बिसराय, काम ठगसों परा ॥ १२ ॥

डड्डा-डसे भुवंगम चोर, विरह विष बाढिया । डसे जो चतुर
सुजान, विरहमें ढारिया ॥ डार पातकूँ छोड़ि, सिपत सबहिं
किया । अरे हाँ अवधू ! डंड बाजके हाथ, प्रान अपना दिया ॥ १३ ॥

ढट्टा-ढोल मारि गुरु कहै, सबन सों टेरिके । ढूँढे सरग
पताल, थके सब हेरिके ॥ कहूँ ढूँढे मतिहीन, कहाँ भटकत फिरे
अरे हाँ अवधू ! ढिगही परमानन्द, चीन्हि नहीं परे ॥ १४ ॥