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सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 968 में से

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पृष्ठ 427

शब्दावली ।

(४१३)

राम परबकी रत्नेनी ॥

ऐसा राम जपु मोर भाई । जासे आवागमन मिटाई ॥८०॥
ज्ञानी बहुत कथे जो ज्ञाना । तासो उपजत मन अभिमाना ॥
सब मिलि सुतु रे ज्ञान हमारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥१॥
पंडित पठि गुन वेद खुलाना । वेद पढे पुनि भेद न जाना ॥
संज्ञा तरपन अरु आचारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥२॥
सन्यासी आपे भगवाना । अहमेव के गरब खुलाना ॥ धरि धरि
अंग लगावै छारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥३॥ अचारी चौका
पाक बनावै । प्रतिमाको ले भोग लगावै ॥ बजावे घंट करै बम-
कारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥४॥ जोगी जोग ध्यान तप
करई । मन पवना दिठ आसन धरई ॥ कंद मूल खनि करै अहारा ।
राम रहा उनहुते न्यारा ॥५॥ जैनी जीव दया प्रति पोर ।
रसना राम नाम नहि उच्चारै ॥ किरतम सो कहै यह करतारा ।
राम रहा उनहुते न्यारा ॥६॥ यती अपने यतको धावे । काम
जीतिके बडा कहावे ॥ हम तो अपना तन मन जारा । राम रहा
उनहुते न्यारा ॥७॥ जंगम फिरै लिंग लरकाई । निसि वासर
शिवहीं को ध्याई ॥ शिव शिव करत गये जमद्वारा । राम रहा
उनहुते न्यारा ॥८॥ मौनी हो मौन गहि रहई । रसना बचन
कहै नहि कहई ॥ लहर कोध घट भीतर धारा । राम रहा उनहुते
न्यारा ॥९॥ तपसी हो तनकूँ दहई । गृह छाडि बन भीतर रहई ॥
देह अज्ञान लगावै छारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥१०॥
जिन्दा होय जिन्दगी जानै । सतका शब्द हिरदय नहि आनै ॥
होय प्रात तब करै पुकारा । राम रहा उनहुते न्यारा ॥११॥
शेख साहिब नहि पहिचाना । भरि भरि मूठी भांग चवाना ॥

नोट—यह रत्नेनी एकही शब्दावलीमें मिली है, जैसी थी वैसेही यहां रक्खी गयी है, पाठकोंको और
कहीं मिले तो शुद्ध करले और मुझे भी सूचित करें तो अगली आवृत्तिमें सुधारको जायगी ।