कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
और नाव ॥ मनही मन संकट घृटिघृटि । सहि रहिजैहो शिर
कूटिकूटि ॥ तेहि कारण चेतहु अबहि वीर समुझाय कहैं तुमको
कवीर ॥ ५ ॥
सतसङ्गतिकी महिमा अनन्त । सुनि साधुसन्त खेलैं वसन्त
॥ टे० ॥ गावैं नारद वीणा बजाय । शङ्कर ताण्डव नृत करत आय॥
शुक्रदेव व्यास सनकादि सङ्ग । लियो भाव भक्तिको घोरि रङ्ग ॥
गुरु ज्ञान गुलाल चढावैं शीश । प्रह्लाद सुदामा अम्बरीष ॥
बलभद्र विभीषण विदुर सूत । अति प्रबल वीर हनुमन्त दूत ॥
नामा पीपा अरु अजामील । रंका वङ्गा पुनि अग्र कील ॥ जेदेव
सैन नाईको ठाट । रैदास भक्त अरु धना जाट ॥ गुरु रामानंदसे
लै अबीर, सब संतनपर डारै कवीर ॥ ६ ॥
होरी ॥
ऐसे नाम उजाकर, होरी खेलन जग आये ॥ टे० ॥ कमल
पत्र पर प्रगट भये हैं, नीहूँ निज गृह लाये । होय शिष्य रामा-
नन्द गुरुके, निरगुण पंथ चलाये ॥ कथि निरणय निरवान अभय
पद, साखी शब्द बनाये । जड पूजाको खण्डन करिकै, आत्मज्ञान
हढाये ॥ सत्य यथार्थ वचन सतगुरुके, सुनि पण्डित खिसिआये ।
षट् दर्शन चरचाको आये, पार कोई नहिं पाये । काशीमें हाँसी
करवाई, गणिका सङ्ग लगाये । निजचरणन जल दारि दयानिधि,
पण्डा जरत बचाये ॥ शाह सिकन्दर कसनी लीना, जरत अग्निमें
डराये । ले यमुनामें पकरि डुबायो, निज समीप गुरु पाये । मस्ता
हाथी आनि झुकायो, सिंहरूप दर्शाये । हाथी आय पन्यो
चरणनमें, सत्य कवीर कहाये ॥ ७ ॥
हमारे को ! खेले ऐसी होरी । जामे आवांगमन लगी ढोरी
१ पीपीकर. २ पटक पटक. ३ भाई. ४ संज्ञाविशेष. ५ निकट, पास. ६ आना जाना. ७ तार.