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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(३६५)

अदंबसे अभिमान तजि, चरणोंमें शिर नाया करो ॥ सुनिके
उपदेशोंको उनके, मनन कर फिर बारबार । निदिध्यासन करके
उसको, काममे लाया करो ॥ दमैवदम् कर याद वह, धर्मदास
उठते बैठते, सत्यसाहिब, सत्यसाहिब, कहके गुनगाया करो ॥१॥

गजल ध्वनि बन्धाव.

भरा सतसंगका दरियाँ, नहालो जिसका जी चाँहै । जिंगरसे
दाँग पाकका, छुडालो जिसका जी चाहे ॥ टे ॥ न ऐसा और है
तीरथ, जगतमें दूसरा कोई । गया हरद्वार जाके, आजैमा लो
जिसका जी चाहे ॥ ऋषी सुनियोंने भी गाई, बहोत कुछ इसकी
जो महिमा । लिखी वह पोथियोमें है, पढालो जिसका जी चाहे ॥
नहीं इसमें जरा तअंजुब, जो फल सन्तोंने फरमाया । कागसे
हंस अपनेको, बनालो जिसका जी चाहे ॥ हजारों रत्न बेशमंत;
भरे आलॉसे आला हैं । जरा इसमें लगा गोतों उठाले, जिसका
जी चाहे ॥ सुकत होना चहो दुखसे, तौ धर्मदास सतगुरुके ।
शरण आ कालसे तिनका, तुडालो जिसका जी चाहे ॥ १ ॥

हे नाथ ! इस जगतमें, सिवा कौन तुम्हारे ? । माता पिता
स्वामी सखा, बंधू है हमारे ॥ टे० ॥ ऐसा दयाल और, नहीं
दूसरा धनी । करि कष्ट नष्ट जीवके, दुखद्वन्द्व निवारै ॥ जब २
तुम्हारा नाम लै, भक्तोंने पुकारा । तब २ सहाय करनेको, आपी
तौ सिधारे ॥ चारों युगोंमें धारि रूप, तुम प्रगट भये । पापी
अनेक तारकै, भवपार उतारे ॥ महिमा अनन्त आपकी, कोई न
कह सके । यह जानि भेद वेद, नेति २ उचारे ॥ अब बेगि मोहिं
दीजे, दर्शन कृपानिधे । होय अति अधीन दीन, धर्मदास पुकारे ॥२॥

विनती मेरी पै ध्यान, जो है तुम्हारा नहीं । आश्रित क्या

१ नम्रतासे. २ निरन्तर. ३ समूह. ४ इच्छा हो. ५ अन्तःकरणसे, विलसे. ६ संस्कार ७ परीक्षा
कर लो. ८ आश्चर्य. ९ कथन किया. १० अमूल्य. ११ श्रेष्ठ. १२ दुबको.