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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(३५८)

कवीरपंथी—

म्हारा साहिब महाने पाईंजी, गुरुज्ञान भाँग डली ॥ टे० ॥
सुरति शिलापर घोटिके काईं, सतगुरु ज्ञान निधान । अमृतसार
निचोडियो जी, मति साफीसे छान ॥ हस्तकमल मस्तक धन्यो,
भक्तिके रङ्ग लगाय । अनुभव प्यालो प्रेमको काईं, महाने दीन्हो
पाय ॥ चठी खुंमारी आंखमें जी, रही निरन्तर छाय । सुख
ब्रह्मा इन्द्रादिको काईं, तृणवत तुच्छ दिखाय ॥ दिव्यदृष्टि उरमें
भईजी, लख्यो आतमाराम सन्ताँकी शरणो लियो महारे, जगसे
रह्यो न काम ॥ पियत भाँग धर्मदासकी जी, मिटी सकल भवपीर ।
अटल बयालिस वंशको काईं, दीनों राज कवीर ॥ ४ ॥

गर्वा ।

देखो २ जगत् यह स्वपना है । ये तो इन्द्रजालकीसी रचना है ॥
टे० ॥ सुत द्वारा ग्रह परिवार सभी है मिथ्या सदा नहीं सत्य
कभी, हाँहाँ अन्त कोई नहीं अपना है ॥ तू जो बाल बृद्ध अरु
जवान भयो, सब माया कृत परपञ्च थयो, भ्रम मात्र ये तेरी
कलपना है ॥ द्विज शूद्र ग्रहस्थ वनस्थ भयो, वर्णाश्रमको अभिमान
गह्यो, त्रयतापसे यह सब तपना है ॥ गन्धर्वनगर जैसे दृष्टि परै,
मृगतृष्णाको नीर न प्यास है, रजुसर्पसे जैसे डरपना है ॥
गुरुदेव कवीर कृपा जो करै, स्वपनेसे जगायकै दुःख है, निज
आतमरूप परखना है ॥ १ ॥

बुथौ खोवे क्यों नरतन पायकैरे । मोहमायाके फन्देमें भुला-
यकैरे ॥ टे० ॥ तरुनपना धन पायकै, मति हो मूढ उतैङ्ग ।
क्षणमें यह उडि जायगा, ज्यों पतङ्गको रङ्ग ॥ बिजली किसी
चमक चमकायकैरे ? ॥ सदा न फूलै केतकी, सदा न भ्रमर लुभात ।
चार दिनाकी चाँदनी फेर अँधेरी रात । पछतायेगा अवसर गँवा-

१ नशा. २ घोखा. ३ बाजीगरका बनाया शहर. ४ मिथ्याजल. ५ रस्तीका लाप, ६ बिना
प्रयोजन. ७ गर्ववाला. ८ एक प्रकार की रङ्गकी लकड़ी. ९ उजाली.