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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(३४८)

कवीरपंथी—

सतगुरु गैलनिया ॥ नहि नहि साहब हो, नहि भइ बोहनिया ॥
चलु गगन में हो, जहाँ तेरि वोहनिया ॥ जब गई गगनमें हो,
गगनमें मगन भव्यनिया ॥ मैं बहुरि न आऊँ हो, भइयाकीसों
वा गलिया ॥ ऐसे कहैं कवीर साहब हो, अटल भई गोवालनिया ॥

गारी ॥ १३ ॥

सुन समधिन चतुर सुजान, कहैं इक बात भली ॥ तु तो
अजहूँ चेत सम्हारि, सपेदी बगर गयी ॥ तेरि खाल गई कुम्हलाय,
ममता अजहुँ न मुखी ॥ चल गगन महलमें हो, निरगुन सेज
विछी ॥ तेरि पायलकी झंकार, झहरमें रोर परी ॥ तेरे दो मारगके
बीच, डगर इक ज्ञान गली ॥ तेरो हटकनहार कौन, निसा सो
आवचली ॥ तोंसों कवीर कहैं समझाय, भजनकर घडी घडी ॥

गारी ॥ १४ ॥

सुनु समधिन संसे गारि । तोंसे बहुत विधि कहौं पुकारि ॥
एतो पीर पैगम्बर जोगी । तैं तो छलि बलि किये वियोगी ॥
एतो पारासरसे जोगी । तैं तो नाही काहूँको छोडी ॥ एतो शृंगी
रिषि ब्रह्मचारी । तैं तो उनहूँकी करी खुवारी ॥ ऐसे कहैं कवीर
बू दारी । मेरे साधासो बहुत विधि हारी ॥

गारी ॥ १५ ॥

तुम समझो कुमति देवरानी । तेरि कीरति जगत बखानी ॥
तेरे काम क्रोध दोउ भाई । हिरनाकुस मारि बहाई ॥ जोगी
शिवशंकर ध्यानी । तेरी गति मति उनहूँ न जानी ॥ तुम रावनके
घर आई । तुम सीता हरन कराई ॥ तुम पंडवनके घर आई ।
उन पासे खेल हराई ॥ तुम कौरवनके घर आई । सब कुनबा नाश
कराई ॥ तोंसों कहैं कवीर समझाई । नकटी तोहि लाज न आई ॥

गारी ॥ १६ ॥

धनि आय सम्हारो हो, घरकी खबर भई ॥ आय धाय गहो
गुरुके चरन, दया करि लइ अपनी ॥ गुरुतत्व लखायो हो, खडी