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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 356

(३४२)

कवीरपंथी—

शब्द घुन ॥ १ ॥ राग सारंग—(समय मध्याह्न काल)

भाग जाके सन्त पाहुने आवें । द्वारे कथा कीरतन करहीं,
हिलमिल मंगल गावें ॥ १ ॥ काम क्रोध मद मान कल्पना,
दुर्मति दूर बहावें ॥ राग द्वेष परनिन्दा तजिके, सत उपदेश
लिखावें ॥ २ ॥ प्रथम लाभ चरणोदक लैकरि, जो कोइ शीश
चढावें ॥ कोटिन तीरथको कर सहजहिं, सो घर बैठे पावें ॥ ३ ॥
खीर खांड पकवान मिठाई, लखि नहिं हेत बढावें ॥ रूखा सूखा
शाकपत्र अति, हितसे भोग लगावें ॥ ४ ॥ महा प्रसाद देवनको
दुर्लभ, सन्त सदा सो पावें ॥ दुष्ट सदा दुर्मतिके घरे, मिथ्या
जन्म गवावें ॥ ५ ॥ गुरु प्रतापसे पूर्वकी सुकृत, कर्म उदय हो
आवें ॥ कहैं कवीर साधु मूरति धरि, साहिब दर्श दिखावें ॥ ६ ॥

॥ शब्द घुन ॥ २ ॥

भाग जाको सन्त पाहुने आवें ॥ द्वारहिं होत कथा अरु
कीरतन, हिलिमिल मंगल गावें ॥ भाग० ॥ १ ॥ प्रथमहिं लाभ
शीत चरणाभृत, महा प्रसादको पावें ॥ भाग० ॥ जेहि कारण
योगि जप तप करहीं, सो फल साधु जिमावें ॥ भाग० ॥ २ ॥
खीर खांड घृत अमृत भोजन, सन्त सदा यहि पावें ॥ भाग० ॥
दुष्ट सदा दुर्मतिके घरे, मिथ्या जन्म गवावें ॥ भाग० ॥ ३ ॥
शिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक, सतगुरु यही लखावें ॥ भाग० ॥
कहहिं कवीर सन्तनकी महिमा, साधुमें साहेब पावें ॥ भाग० ॥ ४ ॥

शब्द घुन ॥ ३ ॥

सोहं हंसा सकल समाना । कायाके गुण आनहिं आना ॥
सोहं० ॥ टेक ॥ माटी एक सकल संसारा । आन आन बासन
गढे कुम्हारा ॥ सोहं० ॥ १ ॥ सरिता सिन्धु औ कूप तलाई ।
एकै नीर सकल रहु छाई ॥ सोहं० ॥ २ ॥ पांच बरणकी दुहिये
गाय । श्वेत दूध देखि मन पतियाय ॥ सोहं० ॥ ३ ॥ कहहिं
कवीर संशय करू दूरी । सब घट ब्रह्म रहा भरपूरी ॥ ४ ॥