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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 352

( ३३८ )

कवीरपंथी—

पद डोरी ॥ ५ ॥

साखी-उत्तर घाटी ऊतरे, पांजी बैठे जाय ।

तहँवाँ सुरति लगायके, पुरुषहि परसे पांय ॥ ६ ॥

शब्द सनेही हँसा, तुम जग तजि होय रहु न्यार ॥ टेक ॥
सत्य निज डोर है, तुम हँसा गहो बनाय । सत बीरा निज नाम है,
चाखतही घर जाय ॥ १ ॥ बिना बीजके जामई, बिनु अंकुरके
झार । बिनु ढण्डी फल लागिया, साधू करहिं बिचार ॥ २ ॥
अजरहिके अंकुर भये, अजरहिकी लागी डार । अजर फूल फल
लागिया, साधू करहिं अहार ॥ ३ ॥ मोहि अजर कर जानहु,
अम्बर देउ बताय । जिहि भाण्डे निज साँच है, तामैं रहो समाय
॥ ४ ॥ कहहिं कवीर धर्मदाससे, बेगि जाहु संसार । सोहंगमकी
बाँहसे, हँस उतारहु पार ॥ ५ ॥

पद डोरी ॥ ६ ॥

साखी-बीरा बद जिन जानहु, पुरुष नाम निज मूल ।

जा दिन हँसा तन तजे, मेटे संशय शूल ॥ ७ ॥

कौन मिलावे योगिया, योगिया बिनु रहल न जाय ॥ टेक ॥
हौं हरिनी पिया पारधी, मारा शब्दके बान । जाहि लगे सोह
जानिया, और दरद नहिं आन ॥ १ ॥ पिया कारण पियरी भई,
लोग कहें तन रोग । जप तप लंघन मैं करौं, पिया मिलनके योग
॥ २ ॥ हौं तो पियासी पीवकी, रटौं सदा पिव पीव । पिया
मिले तो जीवउँ, (न तु) सहजे त्यागौं जीव ॥ ३ ॥ कहहिं कवीर
सुनु योगिनी, तनीमें मनहि समाय । पिछली प्रीतिके कारणे,
योगी मिलेंगे आय ॥ ४ ॥

पद डोरी ॥ ७ ॥

साखी-साथी नाद कवीर हौं, विन्दहिं देहु न भार ।

युग युग हँसा हिरम्बर, नाद उबारन हार ॥ ८ ॥