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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(३१४)

कवीरपंथी—

नख सिखते पूरण भरपूरी । ते साहबको कहिये दूरी ॥ १६ ॥
निरखि निरखि अमृतरस पीजै । तन मन शीश सब अपैण कीजे १६ ॥
दिल दरियामें है हिरामनी । काया कवीर बोलता धनी ॥ १७ ॥
लौकी वाती पवनसे बारी । दीपक ज्ञान शब्द उजियारी ॥ १८ ॥
कहहिं कवीर यह ख्याल हमारी । बिनु समुझन हम सबते
न्यारी ॥ १९ ॥ २३ ॥

आरति कीजै अन्न ब्रह्मकी । सकल कला सुख प्रान पतिकी ॥ १ ॥
धनि धनि अन्न धनि धनि पानी । अन्नकी भक्ति नारायण ठानी
॥ २ ॥ अन्न भयो गिरधरही ध्यान । अन्नमें बसे सबहिके प्रान ॥ ३ ॥
अन्न अहेरी पुरवे जाला । अन्नहिं जिआवे अन्नहिं काला ॥ ४ ॥
अन्नहिं गाया अन्नहिं गावे । अन्न बिना सुख बात न आवे ॥ ५ ॥
अन्न भक्ति ले कीजै कामा । ( कहत कवीर ) तबहीं रीझे
आतमरामा ॥ ६ ॥ २४ ॥

आरती अन्न देव तुम्हारी । जाते काया पले हमारी ॥ १ ॥
जलकी उत्पति यह संसारी । भोजन करे सकल नर नारी ॥ २ ॥
ब्रह्मा विष्णु और महादेवा । यह सब करे अन्नकी सेवा ॥ ३ ॥
राजा प्रजा और मठधारी । ये सब आशा जिये तुम्हारी ॥ ४ ॥
पीर औलिया अजमत धारी । सुर नर मुनि सब अन्न अहारी ॥ ५ ॥
अन्न बनावे अन्न भुलावे । अन्न बिना सुख बात न आवे ॥ ६ ॥
अन्न अहारी पूर्व जियाला । अन्न जिआवे अन्नही काला ॥ ७ ॥
जहां जहां लागी अन्नकी ढेरी । सुर नर मुनि सब बैठे घेरी ॥ ८ ॥
दयाकी दीप भावकी वाती । सब अन्नको आरति साती ॥ ९ ॥
अन्न आरति आतम पूजा । कहहिं कवीर देव नहिं दूजा ॥ १० ॥ २५ ॥

साखी—अन्न नाम निज मूल है, सोई हमारा कीन्ह ।

एक अन्नको वीछुरे, कोइ न काहू चीन्ह ॥ १ ॥

आरती दर्शन समाप्त ॥