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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(२७४)

कवीरपंथी—

न पाइये, बूढ़ि मरै सब कोय ॥ २१० ॥ कविरा हमारे नाम बल,
सात द्रौप नौ खंड । जम डरपे सब भय करै, गाजि रहै ब्रह्मण्ड
॥ २११ ॥ काल फिरि शिर ऊपरै, काल नजर नहि आय । कह
कवीर गुरु शब्द गहू, यमसे जीव बचाय ॥ २१२ ॥
काल फिरि शर साँधिके, हाथ गहे कमान । कह कवीर
गहि नाम निज, छाड़ु मान अभिमान ॥ २१३ ॥ आदि
नाम निज पुरुषकी, सुनतहि तजु अभिमान । कह कवीर सुनु
संत हो, तजो नरककी खान ॥ २१४ ॥ कोटि नाम संसारमें,
ताते मुक्ति न होय । आदि नाम गुरु जाप जो, बूझै विरला कोय
॥ २१५ ॥ सोइ नाम संसारमें, उदित अमोल अपार । ता विन
पार न पावई, बूढ़ि मुये संसार ॥ २१६ ॥ जस देखि फनपति मंत्र,
राखै फनहि सिकोरि । तैसे बीरा नामते, कालरहै मुख मोरि ॥ २१७ ॥
जो जन होवे जौहरी, सो धन ले विलगाय । सोहं सोहं जपि मुये,
मिथ्या जन्म गँवाय ॥ २१८ ॥ साखी पद संसारमें, कहन
सुननको कीन्ह । चिट्ठी आई मूलते, सो धन लैहै चीन्ह ॥ २१९ ॥
सबको नाम सुनावहू, जो आवे तुव पास । शब्द हमारो सत्य है,
दिठ राखो विश्वास ॥ २२० ॥ होय विवेकी शब्दका, जाय मिलै
परिवार । नाम गहे सो पहुँचिहैं, मानहु कहा हमार ॥ २२१ ॥
आदि नाम पारस अहै, मनहै मैला लोह । परसतही कंचन भया,
छूटा बंधन मोह ॥ २२२ ॥ सुरति समावे नामसे, जगसे रहै
उदास । कहै कवीर गुरु चरणमें, दृढ राखै विश्वास ॥ २२३ ॥
यहि विधि करै किसानिया, पोता तलब न होय । भक्त मिलै कोइ