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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 284

(२७२)

कवीरपंथी—

अनेक युग जो पुण्य करै, नहीं नाम बिन ठाम ॥ १८१ ॥ कवीर
हरिके नाम से, कोटि विघ्न टरि जाय। राई समान वसंदरा, केता
काठ जलाय ॥ १८२ ॥ होय नाम जो एक रती, पाप जु रती
हजार। अर्द्ध नाम घट संचरै; जारि करै सब छार ॥ १८३ ॥
सत्य नामको खोजिले, जाते अग्नि बुझाय। बिना नाम बांचे नहीं,
धरमराय धरि खाय ॥ १८४ ॥ गुण गाया गुण ना कटे, रटै न
राम वियोग। अहि निशि हरि ध्यावै नहीं, क्यों पावै दुर्लभ
योग ॥ १८५ ॥ कविरा कठिनाई खरी, लेता हरिको नाम।
सूली ऊपर सेज है, गिरे तो नहीं ठाम ॥ १८६ ॥ कविरा रामहि
ध्याइले, मन करि प्रेम प्रतीति। हरि सागर जनि बीसरे, छीलर
देखु अनोति ॥ १८७ ॥ कविरा राम रिझायले, मनहीमें गुण गाय।
फूटा नग ज्यों जोड़ि मन, सन्धे सन्धि मिलाय ॥ १८८ ॥
चित्त आग जो चमकिया, चहुँ दिशि लागी बाय। हरि सुमिरण
हाथे घडा, वेगी लेहु बुझाय ॥ १८९ ॥ साच बिना सुमिरण नहीं,
भेद विन भक्ति न सोय। पारसमें परदा रहा, लोह किमि कंचन
होय ॥ १९० ॥ नाम विसारे देहकूँ, जीव दशा सब जाय।
जबही छोड़े नामको, तबही लागे धाय ॥ १९१ ॥ कविरा सुमिरण
सार है, और सकल जंजाल। आदि अंत मध सोधिया, दूजा
देखा काल ॥ १९२ ॥ कंचन केवल हरि भजन, दूजा काँच कथीर।
झूठा आल जंजाल तजि, पकड़ो साँच कवीर ॥ १९३ ॥ माला
मोसे लड़ि पड़ा; क्या फेरत हो मोहि। मनका माला फेरिले,
हरि मिलावै तोहि ॥ १९४ ॥ माला फेरत जुग गया, पाया न
मनका फेर। करका मणिका छाड़िके; मनका मणिका फेर ॥ १९५ ॥
माला जपूँ न कर जपूँ, सुखसे कहुँ न राम। हरि मेरा सुमिरण

१ मेरा हरि मोको जप, में पाऊँ विश्वास।