कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
न आवै हह ॥ ६७ ॥ चौपड माडी चौहटे, सारी किया शरीर ।
सतगुरु दाव बताइया, खेलै दास कवीर ॥ ६८ ॥ सतगुरु हमसुँ
रीझिके, एक कहा परसंग । बरषा बादल प्रेमका, भीजि गया
सब अंग ॥ ६९ ॥ सतगुरुके उपदेशका, सुनिया एक विचार ।
जो सतगुरु मिलता नहीं, जाता यमके द्वार ॥ ७० ॥ यमद्वारे पर
दूत सब, करते खींचा तानि । तिनते कबहुँ न छूटता, फिरता
चारों खानि ॥ ७१ ॥ चारों खानिमैं भ्रमता, कबहुँ न लहता पार ।
सो तो फेरा मिटि गया, सतगुरुका उपकार ॥ ७२ ॥ सतगुरुके
सिद्धके किया, दिल अपना कै सांच । कलियुग मोसे लडि पडा,
मोहकिम मेरा बांच ॥ ७३ ॥ सतगुरु सांचा सूरमा, शब्द जो
बाहा एक । लागतही भय मिटि गया, पडा कलेजे छेक ॥ ७४ ॥
सतगुरु शब्दका बाण ले, बाहन लागा तीर । एक जो बाहा
प्रेम सुँ, भीतर विधा शरीर ॥ ७५ ॥ सतगुरु बाहा बाण भरी,
धरकर सूधी मूठ । अंग उघाडे लागिया, गया धुवासुँ फूठ ॥ ७६ ॥
सतगुरु मारा बाण भरि, डोला नहीं शरीर । कह चुम्बक का
करि सकै, सुख लागे वहि तीर ॥ ७७ ॥ लागी गांसी सुख भया,
मरै न ज वै कोय । कह कवीरसो अमर भये, जीवत मृतक
होय ॥ ७८ ॥ हंसि बोलै ना उन सुनी, चंचल मेला मार । कह
कवीर अंतर विधौ, सतगुरुका हथियार ॥ ७९ ॥ गुँगा हूआ
बावरा, बहिरा हूआ कान । पायनसे पंगुला हुआ, सतगुरु मारा
बान ॥ ८० ॥ सतगुरु मेरा शूरमा, भेदा सकल शरीर । बाण
दुवासुँ फूटिया, जीवै दास कवीर ॥ ८१ ॥ सतगुरु सांचा शूरमा,
नख शिख मारा पूर । बाहर घाव न दीसई, भीतर चकना चूर
॥ ८२ ॥ सतगुरु मारा बाण भरि, टूटि गया सब जेव । कहुँ आदा
कहुँ आपदा, तसवीः कहुँ कितेब ॥ ८३ ॥ सतगुरु मारा बाण भरि,