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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 272

(२६०)

कवीरपंथी—

ज्ञान प्रकाशीं गुरु मिला, सो जन विसरि न जाय । जब गोविन्द
कृपा करी, तब गुरु मिलिया आय ॥६॥ गुरु गोविन्द कर जानिये,
रहिये शब्द समाय । मिलै तो दण्डवत बन्दगी, पल २ ध्यान
लगाय ॥ ७ ॥ गुरु गोविन्द तो एक हैं, दूजा सब आकार ।
आपा मेटै हरि भजै, तब पावै करतार ॥८॥ गुरु गोविन्द दोऊ
खड़े, काके लागौ पाय । बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो
बताय ॥ ९ ॥ बलिहारी गुरु आपने, घड़ि घड़ि सौ सौ बार ।
मानुषसे देवता किया, करत न लागा बार ॥१०॥ बूडा था पर
ऊबरा, गुरुकी लहरि चमक । वेरा देखा झांझरा, उतरि भया
फरक ॥११॥ पहिले दाता शिष्य भये, तन मन अरप्यो शीझ ।
पाछे दाता गुरु भये, नाम दियो बखशीश ॥ १२ ॥ राम नामके
पटतरे, देवे को कछु नाहिं । क्या लै गुरु संतोषिये, हवस रही
मनमाहिं ॥ १३ ॥ निज मन तो नीचा किया, चरण कमलकी
ठौर । कहैं कवीर गुरुदेव बिन, नजर न आवै और ॥ १४ ॥
मन दिया तिन सब दिया, मनके लार शरीर । अब देवेको कछु
नहीं, यों कथि कहे कवीर ॥ १५ ॥ तन मन दिया तो भल किया,
शिरका जासी भार । कबहुँ कहै कि मैं दिया, घनी सहैगा मार
॥१६॥ गुरु सिकलीगर कीजिये, मनहिं मस्कला देइ । मनका मैल
छुडाइके, चित दर्पण करि लेइ ॥ १७ ॥ गुरु धोवी शिष कापडा,
साबुन सिरजन हार । सुरति शिला पर धोइये, निकसै ज्योति
अपार ॥ १८ ॥ गुरु कुलाल शिष्य कुम्भ हैं, गढ गढ काटै खोट ।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहे चोट ॥ १९ ॥ ज्ञान समागम
प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास । गुरु सेवा ते पाइये, सतगुरु चरण
निवास ॥ २० ॥ गुरु मानुष करि जानते, ते नर कहिये अन्ध ।
यहाँ दुखी संसारमें, आगे यमके बन्ध ॥ २१ ॥ गुरुको मानुष