कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
न रात ॥ १०२ ॥ बोले जिन्द कवीरजी, सुनु वानी धर्मदास ।
हम खालिक हम खलक हैं, सकल हमार प्रकास ॥ १०३ ॥
गरुडबोध बेदी रची, रामकृष्ण हैरान । लंकापर धाये जबे,
तबका कहूँ बखान ॥ १०४ ॥ दुर्वास सुनि इन्द्रको, हुआ ज्ञान
सम्वाद । दत्त तत्त्वमें मिल गये, जाघर वेद न वाद ॥ १०५ ॥
सिखबन्दी सतगुरुसही, चकवेज्ञानअमान । शीशकटा मन्सूरका,
फेर दिया जिवदान ॥ १०६ ॥ नाभाको सतगुरु मिले, देवल
नेका फेर । पिंडा तो इतही रहा, शब्द कहा हम टेरे ॥ १०७ ॥
रवी रसायन पीवते, झूले धरे अनन्त । चलत बार पाये नहीं,
धन सतगुरु भगवन्त ॥ १०८ ॥ ऐसी संगति जो मिले, भक्ति
गही प्रह्लाद । नारदसे सतगुरु मिले, सूझी अगम अगाध ॥ १०९ ॥
चार मुक्ति वैकुंठ बट, सप्तपुरी सैलान । आगे धाम कवीरका,
हंस न पावें जान ॥ ११० ॥ काया काशी मन मगहर, दोउके मध्य
कवीर । काशी तज मगहर गये, पाया नहीं शरीर ॥ १११ ॥
काया काशी मन मगहर, दोउके वीच मुकाम । जहाँ जुलहदी
घर किया, आदि अंत विसराम ॥ ११२ ॥ नौलख नानक नादमें,
दसलख गोरख तीर । लाख दत्त संगत सदा, चरनो चरच कवीर
॥ ११३ ॥ नौलख नानक नादमें, दसलख गोरख पास । अनंत
संत पदमें मिले, कोटि तैरे रैदास ॥ ११४ ॥ रामानन्दसे लक्ष
गुरु, तारे शिष्यके भाय । चेलाकी गिन्ती नहीं, पदमें रहे समाय
॥ ११५ ॥ खोजी खालकमें मिले, ज्ञानीके उपदेश । सतगुरु पीर
कवीर है, सब काहू परवेश ॥ ११६ ॥ मीरा बाई पद मिली,
सतगुरु पीर कवीर । देहछताँ लौलीनहुइ, पाया नहीं शरीर ॥ ११७ ॥