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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 252

(२४२)

कबीरपंथी—

जवान जमान । गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमहीं चारों खान ॥७०॥
गगन सुन्य गुप्ता रहूँ, हम परगट परवाह । गरीबदास घट घट
बसूँ, विकट हमारी राह ॥ ७१ ॥ आवत जात न दीसहूँ, रहता
सकल समीष । गरीबदास जल तरङ्ग ज्यों, हमहीं सायर सीप
॥ ७२ ॥ गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैट्टू पाताल । गरीबदास
दूँदत फिहूँ, हीरे माणिक लाल ॥ ७३ ॥ इस दरिया
कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहि ठाउँ । गरीबदास माणिक चुगूँ,
हम मरजीवा नाउँ ॥ ७४ ॥ बोले रामानन्दजी हम घर बड़ा
सुकाल । गरीबदास पूजा करें, सुकुट फई जद माल ॥ ७५ ॥
सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ज्ञान । गरीबदास सिरधर
सुकुट, माला अटकी जान ॥ ७६ ॥ स्वामी घुण्डी खोलके, फिर
माला गर डार । गरीबदास इस भजनको, जानत है करतार ॥ ७७ ॥
क्योटी परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय । गरीबदास गुजरी बहुत,
बदनन बदन मिलाय ॥ ७८ ॥ मनकी पूजा तुम लखी, सुकुट
माल परवेश । गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥ ७९ ॥
यह तो तुम शिक्षा दयी, मान लिये मन मोर । गरीबदास कोमल
पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥ ८० ॥ हे स्वामी तुम स्वर्गको, छाडो
आशा रीत । गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥ ८१ ॥
सुन बच्चा मैं स्वर्गकी, कैसे छाई रीत । गरीबदास गुदडी लगी,
जन्म जात है बीत ॥ ८२ ॥ चार मुक्ति वैकुण्ठमें, जिनकी मोरे
चाह । गरीबदास घर अगमके, कैसे पाऊँ थाह ॥ ८३ ॥ हेम रूप
जहाँ धरणि है, रत्न जड़े बहु सोभ । गरीबदास वैकुण्ठको, तन
मन हमरो लोभ ॥ ८४ ॥ शंख चक्र गदा पद्म है, मोहन मदन
सुरारि । गरीबदास सुरली बजै, स्वर्ग लोक दरबार ॥ ८५ ॥
दूधोंकी नदियाँ बहैं, श्वेत वृक्ष शोभान । गरीबदास मन्दिर सुकुट,