कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
नहीं पावेगो जान ॥ ३७ ॥ हे बालक बुधि तोरि गति, कौडी
साखन भौड । दास गरीबहि हदेसकरि, नहीं लेवेंगे डाँड ॥ ३८ ॥
शाह सिकन्दरके बघे, पग ऊपर तर शीश । दास गरीब अगाध
गति, तोर कहा जगदीश ॥ ३९ ॥ कान काट बूचा करे, नली
भरत रे नीच । दास गरीब जहानमें, तुम सर जोरा मीच ॥ ४० ॥
मरत मरत सब जग सुवा, लखै न इस्थिर ठौर । दास गरीब
जहानमें, तुमसा नीच न और ॥ ४१ ॥ नादविन्दकी देहमें,
येता गर्व न कीन । दास गरीब पलक फना, जैसे बुद बुद लीन
॥ ४२ ॥ तिर कतलोंसे बोलते, रामानन्द सुजान । दास गरीब
कुजाति है, आखिर नीच निदान ॥ ४३ ॥ नीच मीचसे ना डरे,
काल कुल्हाड अशीश । दास गरीब अदत्त है, तैं जो कहा
जगदीश ॥ ४४ ॥ जड़िहों हाथ हथकडी, गले तौक जझीर ।
दास गरीब परख विना, यह वाणी गुणगीर ॥ ४५ ॥ परख निरख
नहीं तोहिको, नीच कुलीन कुजात । दास गरीब अकल विना,
वू जो कह यह बात ॥ ४६ ॥ हे बालक नीची कला, तुमही बोलो
ऊँच । दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥ ४७ ॥
महुँके वरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन । दास गरीब मनी
मरी, मैं आजिज आधीन ॥ ४८ ॥ मैं अविगत गतिसे परे,
चारवेदसो दूर । दास गरीब दशो दिशा, सकल सिंधु भरपूर ॥ ४९ ॥
सकल सिंधु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ । दास गरीब अजात हूँ,
तेजि कहा बलि जाउँ ॥ ५० ॥ जात पाँत मेरे नहीं, नहीं बस्ती
नहीं गाउँ । दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥ ५१ ॥
नाद विन्द मेरे नहीं, नहीं गोद नहीं गात । दास गरीब शबद
सजग, नहीं किसीका साथ ॥ ५२ ॥ सब सङ्ग विछुरू नहीं,
आदि अन्त बहु जाँहि । दास गरीब सकल बसौं, बाहर भीतर