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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(२२५)

होय निवारा ॥ २ ॥ पाँचके ऊपर पचिस महतिया, इन परंपंच
पसारा । मन अदली जहँ अदल चलावै, कहा कर जीव विचारा
॥ ३ ॥ ना मोरी नाव नहिं खेवटिया, डर लागे मोहिं भारी ।
चौदह लोकमें कोई नहिं दीसै, तुम गुरु पार उतारी ॥ ४ ॥
धरमदास की यही बीनती, उरझेको निर्वारो । साहेब कवीर
मिले गुरु समरथ, हमसे अधम उबारो ॥ ५ ॥

॥ शब्द १३ ॥

मैं तो तोरे भजन भरोसे अविनासी ॥ टेक ॥
तीरथ बरत कछू नहिं करहुँ, बेद पढौँ नहिं कासी ॥ १ ॥
जंत्र मंत्र टोटका नहिं जानौँ, निमु दिन फिरत उदासी ॥ २ ॥
यहि घट भीतर बधिक बसत है, दिये लोभ की टाटी ॥ ३ ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सतगुरु चरनन दासी ॥ ४ ॥

॥ शब्द १४ ॥

साहेब बंदीछोर हमारे ॥ टेक ॥ ठाठे बैठे चलत निहारे, जागत
साँझ सबारै । करुनासिंधु दयाके आगर, नैननके उजियारे ॥ १ ॥
बोलत बचन मीठ बहु लागे, पूरन पुरुष पियारे । उनकी रहनि
गहनि जब पैहौं, होइ रहु सबसे न्यारे ॥ २ ॥ है बहु ज्ञान ध्यान
बहुतेरो, खोलो गगन किवारै । दयास्वरूप बसै सिंधूमैं, हीरा लाल
निकारे ॥ ३ ॥ साहेब कवीर सदाके सतगुरु, हंसनके रखवारै ।
धरमदास पर दाया कीन्हा, आया सरन तुम्हारे ॥ ४ ॥

॥ शब्द १५ ॥

साहेब मोरी ओर निहारो ॥ टेक ॥ परजा पुत्र अहौं मैं साहेब,
बहुत बात मैं टारो ॥ १ ॥ हौं मैं कोटि जनमको पापी, मन बच
करम असारो । एकौं कर्म छुटे ना कबहुँ, बहु विधि बात बिगारो
॥ २ ॥ हौं अपराधी बहुत जुगनको, नइया मोर उबारो । बंदीछोर

(१) पूर्व । पृष्ठ २२४ पर पढ़ें

कवीरपंथी शब्दावली ८