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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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( २०६ )

कबीरपंथी—

मय, काहेको अन्त लेत प्रभु मेरे ॥ तुमही जानक तुमही प्रेरक,
तुम कवीर हो सुखके डेरे ॥ ४२ ॥

शब्द ४३—सबके जनैयाको कहा जनैये, जानतही सकलो
सुख पैये ॥ टे० ॥ तनकी मनकी सकल लोककी, जाननहारसो
कहा छिपैये ॥ निर्मल संगति करहु संतकी, निर्मल होयके निर्मल
समुझैये ॥ जो जानत तिहुँ लोक रैन दिन, ता साहबको कहा
जनैये । जाग्रत सुषोत्ति तुरिया, तुरियातीत नहि जहँ पैये ॥ वाच्य
लक्ष मनको चतुराई, जहाँ नहि तहँ कैसे कि जैये ॥ विनु पारख
कछु जानि परे नहि, उनकी कृपा विनु परख न पैये ॥ हौ लाचार
सकल विधि साहब, विनय करो तो को चित्त लैये ॥ सुख स्वरूप
कवीर कृपानिधि, पूरनको मन ना भगैये ॥ ४३ ॥

शब्द ४४—वेगि खबरिया प्रभु लीजे दीन दयाला ॥ टे० ॥
आनि परचो परदेशमें देरुयो यमको जाला ॥ इहाँ न कोई आपनो,
तुम विनु रच्छपाला ॥ मोहि तो आधार तेरे नामको, हौ दासन
प्रतिपाला ॥ मोहि कछु बिलम्ब न कीजिये, जीव भये हैं बिहाला ॥
हौ गुणी औगुणी पर, तेरोई कहावत बाला ॥ जो तुम खबरि न
लेहु, तौ मम कौन हवाला ॥ साहब कवीर सुखके राशी, हौ करुणाके
आला ॥ सुनियो अरज निज दासकी, अब करिये निहाला ॥ ४४ ॥

शब्द ४५—अपने हम भोगे निज भोग ॥ टे० ॥ जानि बूझि
कैसे अन्त लेहौ, यह नहि तुमको योग ॥ जगमें दास कहाये
तुम्हारे, लागचो भवको रोग ॥ अस समरथके शरण आयके
छूटचो नहीं मम सोग ॥ साहब कवीर विरदके पालक, हँसन
लैगैगे लोग ॥ ४५ ॥

शब्द ४६—करुणामय नाम तिहारो ॥ टे० ॥ निठुर भये कछु
काज न सरिहैं, आवत विरदको हारो ॥ जग हँसिहैं तब कहाँ बढाई,