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सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(१९३)

सोरठा ।

खबर लीजिये मोर, परख रूप किरपाल प्रभु ।
तुम तजी अनत न ठौर, अबतो आश तुमार है ॥ १ ॥
तात मातें मित्रादि, नहिं कोइ मेरो जगतमें ।
तुम सुहिर्द बर आदि, भवनधि तारो नाथ हम ॥ २ ॥
अवगुन देखहु मोर, नहिं कल्यान जु कल्पसुधि ।
दया दृष्टि कर तोर, अवगुन चित्त न विचारिये ॥ ३ ॥
साहब परम उदार, सुखसागर सुखरूप घन ।
ताते करत पुकार, जो गुरु होहु सहाय अब ॥ ४ ॥

कवित्त ।

दीनोंके दयाल आप कियो है निहाल मोहिं, करो प्रतिपाल
सुख सागर समान हो। नागर विराजमान आगर कहत सब, जनके
दयाल मोहिं हियमें सोहात हो ॥ कहत अगम वेद पार नहिं पावत
सो, मन भरमात मेरो आप सुख सार हो । शुद्ध बुद्ध ज्ञानभारी
सन्तनके रूपधारी, कहे सहदेव भव पारहुके पार हो ॥

आपही पूरन गुरु साहेब कबीरहीसो, तिनको नम्र होय बन्दनी
हमारी है । सुखही सरूप रूप ज्ञानही अनूप भूप, परख प्रकाश
जहां नसे अन्धकारी है ॥ दरसही पाप टारी झाईं संधि काल
जारी, निजपद आप देहीं, बडे उपकारी है। दीनको दयाल प्रभु
सन्तनके उरमाल, कहे सहदेव गुरु ऐसो सुखधारी है ॥

छन्द त्रोटक दुइपदी ।

गुणबन्द निधान सर्वज्ञ प्रभुं । त्रियताप निधारण धीर विभुं ॥
कर्णधार उबारन जीवधनी । स्वयंपारख शोद्धच सुवाक्य मणी
॥१॥ त्रिगुणं रहितं सत भाषण हे । नित परख प्रकास सुसासन
हे ॥ सुगिरामृतधार प्रवाह सरी । पुट श्रावण पानको प्यास

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