कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(१९२)
कवीरपंथी—
भास मिटाइके फाँस छुटाइ दियो, प्रभु कालहि तू अब नाथी ॥
ऐसो दयालको छांडिके रे शठ, तू बहुदेय भुले देह भाथी ॥६॥
जो प्रभु आप सहाय करो नहिं, तो यह जीव रहे भव भीरा ।
अवगुन बापजि माफ करो अब, मैं कछु शील विचार न थीरा ॥
बाल पुकार करे बहुते सर, हे सुख सिंधु करो मन थीरा । साहेब
संत समाज मिले जब, आय लगूँ गुरु ज्ञानके तीरा ॥ ७ ॥
तुमही सब लायक जानत हो सद्, वेद पुरान कुरान अनेका ।
बुद्धि हीन मलीन पुकारत हों, अबहो प्रभु राखहु वेषको टेका ॥
यद्यपि आप विसारहुगे तब, लोक हँसे नरनारि तरेका । ताहिते
शिष्यको भाव धरो अब, शिष्य भरौंस करै गुरु देका ॥ ८ ॥
करसे सुत मात ना छांडत है, शिर दुःख हजार परे मन जोखा ।
जोपै पूत कपूत सही है, जननी न विचार धरे उर धोखा ॥ कवीर
गोसाई मेरे शिरताज, दूजा कहाँ जाये करो तन पोखा । विपति
शर बान दहैं अतिसय, तुव दास लडे चढ़ि ज्ञान झरोखा ॥९॥
कवित्त ।
बालक ज्यों बोले बात तोतरी बनाय करी, मात पितु वाके
सुख माने प्रेम सानिके । ज्यों पै सुत भूल्यो आय जननी पुकारे
धाय, मारे सुख वचन कहत सहुँ आनिके ॥ रोदन करत पूत चले
जात दूर धाय, झांझाहीं विलाप धारि लोटे बहु ठानके । हाथही
अम्बर लेह पोंछि कर उर देह, पीर सब छीन करी गोद लेवे जानके ॥१॥
दोहा—तैसे तुम गुरुदेव प्रभु, लेहु सकल सुख साज ।
भवबन्धन जाते मिटे, सो चाहत मैं आज ॥ १ ॥
पारख शुद्ध विचार करी, ताहि माँहि सुखधाम ।
ताते कहत हूँ आपसो, मोको राखहु ठाम ॥ २ ॥