कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 196, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८८ )
कवीरपंथी—
अमरावति नग्र बसो जेहिमें, तेहि दर चार सुधार बनाये ।
वैराग्य विवेकहुँ ज्ञान गनाय, विचार सो चार गुरु बनि आये ॥
तेहि मध्य सिंहासन आसन तौ, जगे ज्योति सोहंगम चौर
दुराये । सोइ द्वार ते जाय सो पाय तुम्हे, डुतिये विधिसे पुनि
यों कहि गाये ॥ १५ ॥
पद पाडुक और पद त्रान तेरो, पद धूल पदामृत चार विचारे ।
पद पाडुक ते मुक भर्म सबै, पदकी पनही धनही जिव तारे ॥
पद धूल हरे तिहुँ शूलनको, चरणामृत कर्महिं धोय पैवारे । गुरु-
चारहु जल उबार लियो, यम जीतन नाथ प्रताप तुम्हारे ॥ १६ ॥
गुण सिन्धु यथा तुम आगर हो, तिमि औगुण सागर मो सम
नाहीं । दोउ मेल मिले यम जेल ढिले, अस खेल खिले करूणा-
मय बाहीं ॥ कण तुच्छ मिला मन अम्बर जो, तब रेणु हिरम्बर
वेणु कहाहीं । विषयादि समीर सरीरन छै, भवतीर लगे नहि
आवहिं जाही ॥ १७ ॥
दिल देवल देव दया दरिया, थरिया भरिया भरि नैन निहारी ।
दुख दारिद कम्पत चम्पत भो, सुख संपति संपति सो भरभारी ॥
सुखसाज सघट्ट अघट्ट दर्द, फिर आवैं न हट्ट या पनसारी । बयपार
करी बयपार करी, बयपारन संगमें ये बयपारी ॥ १८ ॥
हिरअम्बर चीर कवीर कवी, कविता सविता गुण गावत पायो ।
न टुटे न फटै न कटै कबहुँ, रुचि राउरकी पहिराउर आयो ॥
जो मुनिन्द्र भरे न सो इन्द्रधरे, भगवान कृपा भग बाँन भगायो ।
सतनाम निकाम ररो सुधरो, उधरो दृग दिव्य दयाल बतायो ॥ १९ ॥
गज ज्ञान अपानकि पीठ चढे, दल दैत विकार विषय विह-
राना । गहि वज्र विवेककी टेक हिये, निज नाम निशानको
मारूब्याना ॥ सहस्रश प्रतक्ष स्वरूप लखे, तम भक्ष कृपा भ्रम