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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१५७)

पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ १ ॥ गुरु ब्रह्मस्वरूपं पुरुष
अन्तृपं, सदा समीपं दिव्य सूरूपं । इच्छा जब कीन्हा जग पग
दीन्हा, भगत प्रवीना संतनभूपं ॥ वैराग निधाना ज्ञान विज्ञाना,
धुन ध्यान अन्तृपं उर मालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं
आनंदकंदं जनपालं ॥ २ ॥ चारों युग आये संत कहाये, भर्म
मिटाये जन केरा । जे जन मन भाये ते अपनाये, सत शब्द
हठाये जल बेरा ॥ न पाखंड पूजा देव न दूजा, दिल आतम
हेरा लख लालं । जयपरमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं
॥ ३ ॥ बंकेज बचाये सहतेजी पाये, चतुरभुज गाये मतभारी ।
धरमन बुद्ध आगर सबगुण सागर, पंथ उजागर कुलतारी ॥
द्वादश शिष्य सारे पंथ पियारे, सत शब्द बिचारे सुन आलं ।
जय परमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं ॥ ४ ॥ गनिका
संग लीना ता रंग भीना, करमें कर दीना हंसि डारी । काशी
पुर बासी भये उदासी, देख खवासी मति स्वारी ॥ सब
बोल अबोला राव अडोला, पगपर जल डारी बुझि झालं ।
जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ ५ ॥
पातशाह रिसाना अहमक कूँफराना, बेपीर हराना कर डारी । पग
डार जंजीरा बोरे नीरा, गंगा तीरा फंद टारी ॥ गयंद झुकाये
सिंह दिखाये, बासंदजाली चंद तालं । जय परमानंदं पुरुष
अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ ६ ॥ सिकंदर पीरा भयो अधीरा
कह गुरु पीरा बल जाऊँ । तेहि नाम तमाली कही कमाली, मन
भई खुश्याली सुधमान् ॥ कमाल जियाये सुरदार उठाये, सत-