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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१५२)

कवीरपंथी—

सत सुकृत सत्य स्वरूप सदा । जन ध्यावत पावत मुक्ति-
पदा ॥ मुक्तामनि ते जिव जो जुगता । मृत्यु लोक ससोक न
भव जुगता ॥ २ ॥

हम दीन दुखी किमि त्याग चहौं । करुणामय हो करुणामयहो॥
करुणा तन धारि करी करुणा । करुणामय धौं करुणा वरुणा॥३॥

सुर सिद्ध बखानत खान दया । जिव देखि अनाथ सनाथ
किया ॥ जेहि ज्वाल जला यम भक्ष करे । विनु देव दयाल
को रक्ष करे ॥ ४ ॥

यम जालिम जीवन जेर कियो । सुधि लेन दयानिधि देर
कियो॥ सुख लेश न केत क्लेश भरे । जगदीश परे जगदीस परे॥५॥

जिव काल करालके ज्वाल दहे । तर ऊपर भूपर धाय गहे॥ हम
जानि दयाल जो काल भजे । गुण ग्राम प्रनाम सो नाम तजे॥६॥

घटवाह मलाह सलाह कहो । फिरि कैलकी गैलकी सैल
न हो ॥ वह सिंह समान शिकार करे । पिय पीव विना कहँ
जीव तरे ॥ ७ ॥

हरि केहरि देहरि पार करो । सरकार बडे वर कार करो ॥
भय भंजन रंजन दासनको । खल डाटत काटत कासनको ॥८॥

भवसागर झागर काल बली । तहँ जीवकी उक्ति न युक्ति
चली ॥ नहिं एक उपाय बनाय बनी । करु काज गरीब निवा-
जगनी ॥ ९ ॥

प्रभु पेखतही जिव शीतल है । क्षणमें भवसिन्धुको पार लहे ॥
करुणा दग कोटिन काल हने । सुर सिन्धु कणा गिरि बिन्दु बने॥१०॥

मति धीर कवीर कवीर भजो । हित नाम प्रिया वित वाम
तजो ॥ तपखान किरसान शिलादहके । जरते जिव प्रभु मार-
गते वहके ॥ ११ ॥