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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१४६)

कवीरपंथो-

मुनि केशव वेष गणेशनुतं, सुरराज विराज नरींद्रनुतं ।
सनकादि फणीन्द्र कवीन्द्रनुतं, गुरुदेवमजं विमलं० ॥ २ ॥

करुणामय रूपमनंत कलं, पदपंकजरेणु विशुद्धं जनं ।
पुंज हरं मति शुद्ध करं, गुरुदेवमजं विमलं० ॥ ३ ॥

श्रुति सार विचार इति विभुक्तं, हरिचन्द्रकला संभा विपुलं ।
कवि वंदित पाद सरोजयुगं, गुरुदेवमजं० ॥ ४ ॥

निज रूप मदं फल मोक्ष ददं, सरलं वरदं सुख सिंधु तरं ।
कलि काल विकार सो मोह दह, गुरुदेवमजं विमलं० ॥ ५ ॥

यमभीत हरं पर हेत तनुं, कलु साफ हकं रिषु काम दहं ।
शिव जीव विचार मनो विरतं, गुरुदेवमजं विमलं० ॥ ६ ॥

मद मोह विभंजन सूरपटं, द्विपदं द्विभुजं नररूप शुद्धं ।
विदुषाहृद मोदकरं वचसा, गुरुदेवमजं विमलं० ॥ ७ ॥

सम दृष्टि सुवाद मनो विरतं, भ्रम जालकवाद वितर्क मतिं ।
शुभदं पद सार कवीर वरं, गुरुदेव मजं विमलं० ॥ ८ ॥

स्तोत्र अष्टक ।

विभुं व्यापकं शुद्ध धीरं गंभीरं । सदाशिवरूपं प्रकासी निरीहं ॥
अमोल्यं अडोल्यं अशोच्यं प्रखामि जपेहं भजेहं कवीरं नमामि ॥ १ ॥

निहीसो निराकार निर्वाण रूपं । चिदाकाशमाकाश साक्षि-
स्वरूपं ॥ अभेद्यं अछेद्यं धनी अंत्रजामि । जपेऽहं भजेऽहं कवीरं
नमामि ॥ २ ॥

विषयपंच कोशादिव्यापे न तेही । मदादिक माहि नहिं शोक
जेही ॥ ऐसा सु प्रिये गुरु हे मोहि स्वामी ॥ जपेऽहं भजेऽहं
कवीरं नमामि ॥ ३ ॥

स्वयं सिंधुराशि क्षमाके प्रकाशी । दयानिधिवासी सबे सुख
रासी ॥ सोई धर्मदास गोसाई सुपासी । जपेऽहं भजेऽहं कवीरं
नमामि ॥ ४ ॥