कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 990, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२२ )
कबीरबानी
सातें इच्छा सर्वत्र रहाई । सात बुन्द सब कला है भाई ॥
सातों इच्छा के करता अंकूला । सात करी सब दृष्टिको मूला ॥
तिनके सोरा अंश प्रमाना । एक वचनके सबही बंधाना ॥
आनंद बुन्द है सदा समीपा । तेहि अंकुरको भिन्न है दीपा ॥
एक सुरति एक अंकुर कहाई । तिहिको नाम सहजश्रुति भाई ॥
सात करी मो थाका बनाई । ताकी गतिमति काहु न पाई ॥
दो सुरति इच्छांकुर निर्माई । आठ इच्छा तेहि माँहि उपजाई ॥
सात इच्छा करि सात समानी । आठमी इच्छा काल उत्पानी ॥
तिसरी सुरति मूल प्रकाशा । मूलकीर्ति मूलअंकुर निवासा ॥
सुरतिमूल तिहि माँहि समानी । पांच ब्रह्म तहाँ भये उत्पानी ॥
सहजब्रह्मके पांचतत्त्व भये भाई । तरव सनेही सर्व उत्पन्न आई ॥
दुसरी इच्छा ब्रह्मको चीन्हा । सुकृत चिन्ह उत्पन्न कीन्हा ॥
तिसरो ब्रह्म मूल परवानी । मूल सुरति सब सृष्टि उत्पानी ॥
चौथे सोहं ब्रह्म कहावा । तेहि अण्डमों सर्व समावा ॥
पाँचों ब्रह्म जलाहल भयऊ । चौदह अंश गुप्त निर्मयऊ ॥
तीनि सुरतिकी एती रचना । चौथे सोहं कठे अमृत बचना ॥
सुरति अभयबुन्द तिन्ह पावा । तेहमें आठ अंस निरमावा ॥
चार गुप्त चार प्रगट पसारा । आपसहूपमिल आठों अमी अपारा ॥
तिनके भिन्न भिन्न परमाना । चार अंश भये सृष्टि बंधाना ॥
चार अंश भये मुक्त प्रमाना । तिन्हको भेद न काहु जाना ॥
अंशाहि अंश काहु नहीं देखा । शब्द स्वरूपी सबको पेखा ॥
तेहिके सनद अब कहां समुझाई । जेष्ठो अंश अचित्त है भाई ॥
तिनके प्रेम सुरति घट आई । तेहि प्रेममें मोह समाई ॥
तेहि मोहमें अक्षर उत्पानी । अक्षर जारि वेद सहेदानी ॥
अक्षर तेहि ते चारे भये दीपा । चार अंशने रहे समीपा ॥