कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 989, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १२१ )
सेहजंकर तिह नाम कहाई । सात सुरैति तिहि मांहि रहाई॥
टेकाज्ञान कहतहों भाई । जेहि सुनि हंमा लोके जाई ॥
धर्मदास सुनिये चितलाई । यहि कलसा सब ज्ञानके भाई ॥
बीजक ज्ञान सब कहूँ निशानी । तेहिपर बीजक निश्चय ठानी ॥
सात करीके निर्णय सुनिहौ । बिना भेद तुम कछु न गुनिहौ ॥
भेदमें भेद हम राखौ गोई । सो पर सून्य लखो ना कोई ॥
इच्छा सीप स्वरूप उतपानी । सोवाती स्नेह भये परसानी ॥
बुंद एक आनंद स्वरूपी । इच्छा सात भये भिन्न स्वरूपी ॥
इच्छा सात रुचि अपने भाई । तेहि प्रमान बुंद तिन्ह पाई ॥
तेहिते पाँच अंड निर्माई । दोए करी तहाँ गुप्त छिपाई ॥
तेहिमें गुप्त अंश रहे वासा । प्रथम करीने बुंद निवासा ॥
तेज अण्ड तहाँ भयो प्रकाशा । तेहिमें सब है जीव निवासा ॥
इच्छाके नाम
मुख्य इच्छा तेहि इच्छाको नामा । आदि बुंद तिहि बुन्दको धामा ॥
दूसरी इच्छा नेत्र भरी हरे । सुकृत अण्ड भए तेहि केरे ॥
नेत्र इच्छाते नेत्र बुन्द पावा । तेहिमें सुकृत अंश निरमावा ॥
तिसरी इच्छा अविगत बानी । श्रवण इच्छामें आनि समानी ॥
श्रवन बुन्द अंश तिन्ह लीन्हा । अबोलनाम तेहि बुन्दको दीन्हा ॥
चौथे अण्डमें सत्य पसारा । चौथी इच्छा सो वास उच्चार ॥
स्वाती इच्छा तेहि करिको नामा । स्वाती बुन्द स्वाति सब धामा ॥
स्वतिते क्षमा अण्ड निरमाई । अण्ड पाँचमों कहुँ समुझाई ॥
पाँचही इच्छा निमिष ठेहेराई । करा एकमें जीवन पराई ॥
स्वाति प्रसन इच्छा उपजाई । जलहि अंड तहाँ उपज्यो भाई ॥
पाँच इच्छाके पाँच अण्ड निरमाई । दोये इच्छा वेही गुप्त रहाई ॥
छठि इच्छा है करता भाई । करति बुन्द तेहि मांहि समाई ॥