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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 987

बोधसागर

( ११९ )

प्रथम अंगते भए आगे सब निकास कई । सात इच्छा सातहीं अंश । अनइच्छाते आठों अंश भए । आठवाँ अंश भए । ते लोक भयो सर्व सृष्टिका संहार करे ।

बीजक सारकी साखी-कहैं कबीर ।

सात इच्छाके सात अंश भए, अपने अपने भाव ।

आठवा अंश विन इच्छा उपजै, ताको धर्म लखाव ॥

धर्मदास उवाच-एह धर्मदास ने पूछी ।

आहो साहेब काहेते समर्थ कहत हैं ? काहेते अचिन्त कहत हैं ॥
काहेते अक्षर कहत हैं ? काहेते जोगमाया कहत हैं ॥
काहेते कल कहत हैं ? इतना भेद कहो समुझाई ॥
भिन्न गुरु देह बताई । एहिकी शास्त्र गुरु कहैं ॥
सुनो धर्मदास तखतके धनी । तासो समर्थ कहत हैं ॥
तिनते आठ अंश भए । आठमें जेठ अचिन्त भये ॥
तिनके चिन्ता नाहीं । ताहिते अचिन्त कहाये ॥
तिनके प्रेम सुरति भई । तेहि प्रेममें अक्षर आनिसमानो ॥
तब मोह तत्व उपज्यो । तेहि मोहते चार अंश भए ॥
तेहिते चौरासी लक्ष्य जोनी भई । ८४००००० । तेहिते अक्षर ॥
कहाये । अब कैलकी हकी कत सुनो । तब अक्षरके मोहतत्त्व ॥
उपज्यो तेहि कारणते कैल भयो । मनसाते बुन्द पैदा कियो ॥
सो जहाँ अक्षर बैठो हतो । तहाँ जल तत्त्व हतो ॥
तेहि जलमें एक बुन्द आनिपडो । तेहि बुन्दते एते एक अंड भयो ॥
तब अक्षरने देखा उठिके । तब अण्ड लंगि आयो ॥
एक हकीकत लिखी हती । अंडके मुख ऊपर छाप हतो ॥
कहैं सृष्टिकी रचना करौ । और एक अंश हम पठायो है ॥
सो तुमते दूसरी करी है । सो तुम जिन पतियावो । जहाँ लंगि