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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 986

( ११८ )

कबीरबानी

तेहि कारण सबमोहि बतावहु । केहि कारण प्रपञ्च उर लावहु ॥

सारखी-चार सुरति सब मूल है, तुम समरथ परवान ।

तुमरे अंगते उपजि कहु, चारहुको अनुमान ॥

सारखी-बीजके कलसाकी-कीसा सतगुरु उवाच ।

धर्मदास मैं कहु न छिपाऊँ । तुमको सकलहि भेद बताऊँ ॥
प्रथमहि समरथ आप हते, दूसरो कोई न हुए । तब समरथके
मुखते, सहजहि सुरति भये ॥ सोह सुरति स्वरूप धरि सहजहि
बुन्ददयो । तेहिते सहजहि सुरतिका सहज अंकूर भयो ॥ तेहि
अंकुरते सप्त करि भए ॥ दूसरे समर्थके अंशते क्षमास्वरूप सुरति
भये ॥ तब स्वाती सरूप बूँद दियो जौन कारन सुनो ॥ जैसो
सांचो तैसो स्वरूप जैसो घात तैसो अनूप ॥ एतो ठेका बँधे
जब भयऊ इच्छासात । ७ ) अंड पांच ( २ ) चारी अंड एक
सिद्धके ॥ ४ ॥ १ ॥ चारों स्वरूप भिन्न भिन्न हैं ॥ पांचो अण्ड
प्रचण्ड भयो । दोउ करीमें अण्ड ना भयो ॥

ताहिकरीमें दो अंशहते । एक करीमें अक्षर हतो एक करीमें माया
हती । एहि मता अवगति हतो । आगे तिसरी सुरतिको लेखासु-
नो अविवगति सुरत अशून्य । तीसरी सुरतिका लेखा सो सुरति सखन
उपजाई । तेहिको नाम मूल सुरति है ताह सुरतिको अंगल बूँद
दीन्हाँ तेहि पांच ब्रह्म भये तिनको आज्ञा दर्ई एक एक ब्रह्म
एक एक अंडन में आए, एते ब्रह्मते पांच अंश भये । तेही तत्त्वके
घर भये । अण्ड फूटो पांच तत्त्व प्रगट भये । ६ । चौथी सुरती
श्वासाते भये । ४ । तेहिको नामसोहं दियो । तेहिसोहंके ओहं बुद
कन्हहाँ तेहिमें आठ अंस भये । सो एती रचना चारिकीरति कियो