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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 968

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कबीरबानी

साखी-कहै कबीर

देखि स्वरूप कन्यहिको, मनमें रोष समाय ।
मनमें रोष भयो अति, कन्या लीन्हीं खाय ॥

लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । पुरुष वचन ले हृदय सम्हारा ॥
तब सुरति बानते कैलहि मारा । कन्या तब उगलै बहि पारा ॥
एहि प्रपंच अक्षर तब कीन्हा । ताते कैल मती हरि लीन्हा ॥
कन्या सुरति तब गई भुलाई । जबते पेट कैलके आई ॥
पिता पिता कैलसो कहेऊ । मदन प्रचंड कल छन भयेऊ ॥
अष्टांगी कैल एकमत कीन्हा । ताते सृष्टि रचवे मन दीन्हा ॥
किया संयोग भयो त्रीवारा । जेठो ब्रह्मा लघु विष्णु कुमार ॥
तीजे शंभु विष्णु ते छोटा । येकही निरंजनहि के ढोटा ॥

साखी-कहै कबीर

जैसे रूप निरञ्जनहिं, तैसे तीनों भाय ।
जे उत्पत्ति कैलकी, आगे सृष्टि उपाय ॥

चौपाई

करि प्रपंच शून्य इंडमें गयऊ । मनमें बहुत आनंदित भयऊ ॥
एहि आनन्दमें गए भुलाई । ताते श्वासा सुरति उठाई ॥
तेहि श्वासाते वेद कटि आई । रूपनिधान चारों बने भाई ॥
हाथन पोथी सुसरस बानी । ताते कैल भयो अभिमानी ॥
चारि वेद सब मरम बतावा । तब चलि अक्षर शून्यमें आवा ॥
कैल प्रचण्ड भयो बरियारा । तब अक्षरते बुद्धि विचारा ॥
येतो कैल औ जीव विचारा । समरथ छाप लियो टकसारा ॥
अक्षर चले अर्चित लगिगयऊ । महाशून्य छोड़ी तब दयऊ ॥
तब अर्चित्य अक्षर समुझावा । यह अविगति गति काहु न पावा ॥