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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 966

( ९८ )

कबीरबानी

चारि अंस भये चारि प्रकारा । चौविध दीप चौविध हि पसारा ॥
प्रथम अंश पर माया भयऊ । सोपृथिवितत्वको वीज निर्मयऊ ॥
दुसरे कर्म भये अवतारा । पालंग अठानवे कीन्ह विस्तारा ॥
तिसरे अदली अंश निरमावा । शेष नाग सो नाम धरावा ॥
चौथे अंश भये धर्म राई । जिन्ह पाप पुण्यको लेखा पाई ॥
चारी अंश अक्षर ते भयऊ । चार अंश चार मत ठयऊ ॥
तब समर्थ अविगति एक कीन्हा । पूरी नींद अक्षरकूँ दीन्हा ॥
चौसठ युगलौं सोए सिराई । तोलों कैल सुरती ठहराई ॥
समर्थ सुरति जल तत्व समानी । कैल अंड की कीन्ह उपानी ॥
तेहि पीछे अक्षर पुनि जागा । मोह तत्त्व भये अतुरागा ॥
चकित होय अक्षर बिलखाना । सोह मोह सब सृष्टि समाना ॥
अंड दृष्टिमें देखो भाई । व्याकुल भए यह किन निरमाई ॥
समर्थ छाप अंडसिर दीन्हा । अक्षर छाप देखि सौ लीन्हा ॥
सोई अंड जलमें विराना । जिनको वेद नारायण माना ॥
तहवां ज्योति निरञ्जन भयऊ । तिनको सब जग कर्ता कहेऊ ॥
अक्षर सुरति समर्थकी बानी । तेहि गुण खेल भए उतपानी ॥
निरंजन नाम अक्षर ठहराई । अचित भेद नहि पावै भाई ॥
कैलहि देखा सकल पसारा । तब अक्षर सो वचन उचारा ॥
देउ पिता मोहि आज्ञा सोई । जो कुछ इच्छा उपज्यो मोई ॥
सेवा करत सत्तर जुग बीता । तब मुख बोले पुरुष अतीता ॥
जीव पुत्र जहां पृथ्वीको मूला । तहां कर्म बैठे अस्थूला ॥
सृष्टि भंडार कूर्मको भाई । सोलह माथ हाथ चौसठ पाई ॥
चले निरञ्जन कूर्मलिंग आये । पुरुष ध्यानते कर्म जगाये ॥
उत्पति हमकूँ मागे देहू । ना देहो तौ तौ मारिकै लेहू ॥
तबहि कूर्म अपने मन मानी । एतो कैल भए अभिमानी ॥