कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 919, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ५१ )
इनको गर्भ न चौरै भाई । भक्त होय सबको सुखदाई ॥
गर्भहि मांझ ज्ञान तेहिं दीन्हौ । नारद एक काम बड़ कीन्हौ ॥
हृद कीन्हौ तेहिं गर्भके माहीं । वर्ष हजार रही तिहि ठाहीं ॥
फिर नारी अपने पुर आई । इन्द्रजीत हिरनाकुश पाई ॥
तहां जन्म लीन्हो प्रहलादा । राम रटन रसना ले स्वादा ॥
ऐसो रटन लगाये भारी । तामसभक्त न कोइ अधिकारी ॥
केतो कष्ट सहे सिर अपना । तबही दुःख न व्यापे सपना ॥
हिरनाकुशके मनमें आई । राम तेरो मोहिं देहु बताई ॥
स्वम्भ फार लीन्हौ अवतारा । हरि नरसिंह रूप तब धारा ॥
हिरनाकुश नख उदर विदारा । अपने जन प्रहलाद उबारा ॥
फिरके इन्द्रासन पहुँचाया । सर्गुण भक्तिजान सब माया ॥
ऐसे दृढ़व्रत रामहि गहिया । तेज्ज इन्द्रासन सुख लहिया ॥
ऐसे भक्त न होवे भाई । ताकी गति तुमको समुझाई ॥
इन्द्रासनको राज सुनाऊं । महा भोग बड़े सुख पाऊं ॥
सत्तर दाय चौकड़ी भुगता । बन्धन भवके होय न मुक्ता ॥
बड़े भक्त की कथा सुनाई । पूछो और कहो तोहिं भाई ॥
साखी-इन्द्र राजसुख भोगकर, फिर भवसागरमाहिं ।
यह सर्गुणकी भक्ति है, कबहुँ निर्भय नाहिं ॥
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास बूझे चित लाई । सतगुरु संशय देहु मिटाई ॥
सर्गुण भक्त मुक्त नहिं होई । है वह एकहि या है दोई ॥
यह संदेह मिटाओ मेरा । तुम सतगुरु मम बन्दी छोरा ॥
की सर्गुण को निर्गुण कहिये । भिन्न भिन्न भेद मोहिं कहिये ॥
सकल मृष्टि कहैवाते भयऊ । यही युक्ति काहु नहिं कहऊ ॥
जो मोहिं ऊपर दया तुम्हारी । सबविधिकहियेयुक्ति विचारी ॥