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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 918

( ५० )

भवतारणबोध

निकसे गृह ते बाहर गयेऊ । नारदके उपदेशी भयेऊ ॥
छठें मास प्रकटे हरि आई । राज दिये वैकुण्ठ पठाई ॥
साठ हजार वर्ष दियो राजू । कुटुम सहित वैकुण्ठ विराजू ॥
एकदिवस जब प्रलय हूय आई । तहाँ तो पुनि ये देह गिराई ॥
पुनि सामीप्य मोक्ष कर दीन्हा । परम पुरुष गति तबहु न चीन्हा ॥
काल पुरुष राखे सब घेरी । सत्य पुरुष जग जाय न हेरी ॥
ऐसे भक्त भये जग माहीं । परम पुरुष गति पावत नाहीं ॥
भक्ति सगुण करे यहि पावे । निर्गुण माहीं नाहिं समावे ॥
जो सायुज्य होय गति पूरी । देव निरंजन जाय हजुरी ॥
ज्योनि स्वरूपी ताका नाऊँ । चारों सुक्त बसैं तेहिं ठाऊँ ॥
सालोक्यहि सामीप्य कहाई । सारूपी सायोज्य लहाई ॥
चार मुक्ति जाके घर होई । ताको पार न पावे कोई ॥
ताके परे मोर अस्थाना । कैसी भक्ति कहा कहों ज्ञाना ।

साखी-ध्रुवकी गति तुमसों कही, सुन धर्मदास सुजान ।

अपरम्पार न पावही, पूर्ण पद निर्वान ॥

चौपाई

सुन धर्मन एक कथा नियारी । बड़ी भक्ति प्रहलाद विचारी ॥
हिरनाकुश दोनों बलकारा । ताके घर लीन्हा अवतारा ॥
तपके हेतु गये बन माहीं । कोइ बातको संशय नाहीं ॥
गर्भवन्त होती तिहि नारी । इन्द्र आवाज सुनि अधिकारी ॥
नभवानीते भई अवाजा । इन्द्रासनको लेही राजा ॥
हिरनाकुश घर जन्म धराई । सो द्वारासन लेही भाई ॥
इन्द्रहि संशय उपजो भारी । गर्भ वातसों देहों ठारी ॥
ये छल इन्द्र कियो अधिकारी । अपने देशहिं ले गयो नारी ॥
तेहिं क्षण नारद आये तहँवाँ । इन्द्रहिको समझायो जहँवाँ ॥