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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 906

( ३८ )

ज्ञानबोध

अमर लोक साहबका न्यारा । जहाँ पुरुष का है दरबारा ॥
आदि पुरुष जहाँ आप अकेला । धर्मराय नहि मन के मेला ॥
अंधकार जहाँ कबहुँ न होई । सदा जोति अमरापुर सोई ॥
आदि पुरुष जहाँ काल न जाई । तीन देव की कौन चलाई ॥
आदि नाम जो ध्यान लगाई । तब हँसा सत लोकहि पाई ॥
ऐसा लोक साहबका भाई । जहाँ हँसा सुख सदा रहाई ॥
तादि लोकमें जो कोइ जावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥
धर्म राय से तिन का टूटे । जन्म मरण को संशय छूटे ॥
बिरले जीव निःसंशय होई । दृढ़ परतीत नाम गहँ सोई ॥
अगम भेद मैं तुम्हें बताया । काल निरञ्जन गम्य न पाया ॥
जगके जीव प्रबोधो भाई । पुरुष शरण जब हँसा जाई ॥
जीवहि बोधो सब संसारा । पकड़ हँस फँको पैले पारा ॥
भवसागरसे जीव उबारो । जन्म मरण जिव संशय टारो ॥
जीव मुक्त मैं तुमको दीन्हा । पुरुष भक्ति है नामको चीन्हा ॥
सार युक्ति मैं तुमसे कहिया । कहन सुननको अब नहिं रहिया ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास विनवे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥
निरगुन नाम लखे नहिं कोई । सरगुनमें जग भरमें सोई ॥
अज्ञानी जिव कहा न माने । आदि नामको भेद न जाने ॥
यह सब भेद कहो प्रभुराई । कैसे जीव प्रबोधों जाई ॥

साहिव कबीर वचन-चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । अब मैं भेद कहाँ तुम पासा ॥
सज्जन जन जो होवे भाई । तुम्हरे शरन दौरके आई ॥
तन मन तुमसे ध्यान लगाई । ताको नाम सुनइयो भाई ॥
जब देखहु तुम दृढ़ता ज्ञाना । तबही देव पान परवाना ॥